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हाईकोर्ट का अयोध्या ट्रस्ट जमीन फर्जीवाड़ा एफआईआर में दखल से इनकार

याची गोपाल मिश्र को अदालत ने कानून के तहत अग्रिम जमानत लेने की छूट दी

अयोध्या हाईकोर्ट जमीन विवाद मामले से जुड़ी प्रतीकात्मक तस्वीर
प्रतीकात्मक तस्वीर, AI से बनाई गई। यह वास्तविक घटना का चित्रण नहीं है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने अयोध्या स्थित महर्षि रामायण विद्यापीठ ट्रस्ट की जमीन से जुड़े धोखाधड़ी मामले की एफआईआर रद्द करने से इनकार कर दिया है। अदालत ने याचिकाकर्ता गोपाल मिश्र से कहा है कि वे नियमानुसार अग्रिम जमानत के लिए संबंधित न्यायालय में आवेदन कर सकते हैं।

गोपाल मिश्र की याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान और न्यायमूर्ति राम मनोहर नारायण मिश्र की पीठ ने यह निर्देश जारी किया। याची ने दलील दी थी कि यह मामला मूलतः दीवानी प्रकृति का है, इसलिए एफआईआर को चुनौती देकर उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगाई जाए।

ट्रस्ट के वकील ने किया विरोध

ट्रस्ट की ओर से पेश वकील ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि यह सिर्फ संपत्ति का दीवानी विवाद नहीं है। उन्होंने दलील दी कि दस्तावेजों और जमीन के लेन-देन से जुड़े आपराधिक कृत्यों के आरोप भी इसमें शामिल हैं, इसलिए जांच में दखल नहीं दिया जाना चाहिए।

क्या है पूरा मामला

एफआईआर के अनुसार, मांझा बरहटा की जमीन को लेकर वर्ष 1984 में गोपाल मिश्र ने मुख्तरनामा के आधार पर खुद को अपने पिता का एकमात्र वारिस बताकर बैनामा कराया था। बाद में मंगला मिश्र ने दावा किया कि वह गोपाल मिश्र का भाई है और इसी आधार पर उसने जमीन के आधे हिस्से पर हक जताना शुरू कर दिया।

जब यह विवाद गहराता गया, तो ट्रस्ट की ओर से एक प्रतिनिधि ने अयोध्या कोतवाली में शिकायत दर्ज कराई। हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद याचिका को निस्तारित करते हुए जांच में दखल से इनकार कर दिया।

अब याची गोपाल मिश्र को गिरफ्तारी से बचने के लिए संबंधित अदालत में अग्रिम जमानत के लिए आवेदन करना होगा। मामले की आगे की जांच पुलिस स्तर पर जारी रहेगी।