बेल्जियम से मंगाया गया 200 टन वजनी एक विशाल वेसल इन दिनों उत्तर प्रदेश के हाईवे पर सुर्खियों में है। इसे लखीमपुर खीरी जिले की बलरामपुर चीनी मिल यूनिट और एथेनॉल प्लांट में लगाया जाना है।
8 मीटर ऊंचे और 7 मीटर चौड़े इस वेसल को ओडिशा के पारादीप बंदरगाह से 308 पहियों वाले हाइड्रोलिक मल्टी-एक्सल ट्रेलर पर लादकर ले जाया जा रहा है। सोशल मीडिया पर इसे लोग 'महाट्रक' के नाम से पुकार रहे हैं।
यूरोप से ही क्यों मंगाना पड़ा वेसल
यह वेसल साधारण लोहे का टैंक नहीं, बल्कि एथेनॉल और एडवांस शुगर प्रोसेसिंग के लिए बना जटिल प्रेशर केमिकल रिएक्टर है। इस तकनीक के वैश्विक पेटेंट बेल्जियम जैसी यूरोपीय स्पेशलाइज्ड इंजीनियरिंग फर्मों के पास हैं।
ऐसे औद्योगिक वेसल को अत्यधिक दबाव, उच्च तापमान और संक्षारक रसायनों को झेलने के लिए डिजाइन किया जाता है। यूरोपीय कंपनियां इस काम में लगने वाले खास मटीरियल और टेस्टिंग के लिए दुनियाभर में जानी जाती हैं।
जब कोई चीनी मिल या बायोप्लास्टिक प्लांट विदेशी तकनीक पार्टनर से सेटअप का ठेका देता है, तो गारंटी-वारंटी की शर्तों के तहत मुख्य उपकरण उसी विदेशी कंपनी की सर्टिफाइड यूनिट से बनकर आते हैं।
भारत में निर्माण क्यों नहीं हो सका
वेसल बनाने में इस्तेमाल होने वाली विशेष ग्रेड अलॉय स्टील शीट और उसकी बारीक वेल्डिंग तकनीक का वैश्विक विशेषज्ञ केंद्र यूरोप ही है। भारत में इतनी हाई-टेक मशीन को एक या दो पीस के लिए शुरू से बनाने का ढांचा तैयार करना आर्थिक रूप से बहुत महंगा साबित होता।
इसी वजह से पहले से स्थापित विदेशी प्लांट से इसे रेडीमेड मंगाना ज्यादा व्यावहारिक और किफायती विकल्प माना गया।
रास्ते में उमड़ रही भीड़, हट रहे बिजली के तार
ट्रेलर जिस भी हाईवे से गुजरता है, वहां लोगों की भीड़ इसे देखने के लिए जमा हो जाती है। कई जगह लोग इसे अजूबे की तरह देखकर वीडियो बनाकर इंटरनेट मीडिया पर साझा कर रहे हैं।
ताजा जानकारी के अनुसार यह महाट्रक वाराणसी तक पहुंच चुका है और आगे के रास्ते में बिजली के तार व सड़क किनारे लगे बोर्ड हटाते हुए बढ़ रहा है।
40 कर्मचारियों का काफिला, रोज 30 लोगों का खाना
इस लंबे सफर के लिए ट्रक के साथ 40 से अधिक कर्मचारियों का काफिला चल रहा है। इनके खाने-पीने और रहने का पूरा इंतजाम ट्रेलर के साथ ही किया गया है।
चारपाई और गृहस्थी का सामान भी ट्रेलर पर लदा है। करीब 30 लोगों का खाना रोज ट्रेलर पर ही बनता है, जबकि रात में काफिला जहां रुकता है वहां तिरपाल से बने अस्थायी ठिकानों में कर्मचारी सोते हैं।
ट्रक चालक सुरेश चंद्रा ने बताया कि रोजाना करीब 200 लीटर डीजल खर्च हो रहा है। उन्होंने कहा,