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दुनिया में डीजल की कमी, भारत की कमाई बढ़ी! अक्टूबर में निर्यात 7.1 लाख बैरल रोजाना, 13 महीने का रिकॉर्ड टूटा

पश्चिम एशिया और रूस-यूक्रेन संघर्ष से वैश्विक सप्लाई प्रभावित होने का भारतीय रिफाइनरियों को फायदा; रिलायंस इंडस्ट्रीज ने कुल निर्यात का करीब 78% हिस्सा भेजा।

दुनिया में डीजल की कमी, भारत की कमाई बढ़ी! अक्टूबर में निर्यात 7.1 लाख बैरल रोजाना, 13 महीने का रिकॉर्ड टूटा
प्रतीकात्मक तस्वीर, AI से बनाई गई। यह वास्तविक घटना का चित्रण नहीं है।

वैश्विक ऊर्जा बाजार में डीजल की बढ़ती मांग और आपूर्ति की कमी के बीच भारत के पेट्रोलियम क्षेत्र से बड़ी खबर सामने आई है। अक्टूबर 2026 में देश का डीजल निर्यात बढ़कर औसतन 7.1 लाख बैरल प्रतिदिन पहुंच गया। यह पिछले 13 महीनों का सबसे ऊंचा स्तर है। सितंबर के मुकाबले निर्यात में करीब 19.6 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

यह आंकड़ा 1 से 29 अक्टूबर के शुरुआती पोत-ट्रैकिंग डेटा पर आधारित है, जिसे कमोडिटी मार्केट एनालिटिक्स कंपनी Kpler ने उपलब्ध कराया है। यानी यह पूरे अक्टूबर का अंतिम आंकड़ा नहीं, बल्कि महीने के शुरुआती 29 दिनों का औसत है। पिछले साल अक्टूबर की तुलना में भी निर्यात करीब 8.1 प्रतिशत अधिक रहा।

इस बढ़ोतरी के पीछे सबसे बड़ा कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में डीजल की कमी और बेहतर निर्यात मार्जिन बताए जा रहे हैं। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और रूस की रिफाइनरियों पर यूक्रेनी ड्रोन हमलों से वैश्विक ईंधन आपूर्ति प्रभावित हुई है। ऐसे समय में भारत की बड़ी रिफाइनिंग क्षमता ने उसे अंतरराष्ट्रीय बाजार में एक महत्वपूर्ण सप्लायर के रूप में उभारा है।

13 महीने में सबसे ज्यादा डीजल निर्यात

Kpler के शुरुआती आंकड़ों के मुताबिक, अक्टूबर में भारत ने प्रतिदिन औसतन 7.1 लाख बैरल डीजल विदेशों में भेजा। सितंबर में यह मात्रा इससे कम थी। एक महीने में करीब 19.6 प्रतिशत की बढ़ोतरी इस बात का संकेत है कि भारतीय रिफाइनरियां अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़े अवसरों का फायदा उठा रही हैं।

The New Indian Express की रिपोर्ट में अक्टूबर के निर्यात का आंकड़ा करीब 7 लाख बैरल प्रतिदिन बताया गया है। दोनों रिपोर्टों में मामूली अंतर है, लेकिन दोनों इस बात की पुष्टि करती हैं कि निर्यात सितंबर 2025 के बाद सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंचा है।

रिलायंस इंडस्ट्रीज बनी सबसे बड़ी निर्यातक

अक्टूबर में डीजल निर्यात बढ़ाने में निजी क्षेत्र की दिग्गज कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (RIL) की सबसे बड़ी भूमिका रही।

Kpler के आंकड़ों के अनुसार, रिलायंस ने अक्टूबर के 1 से 29 तारीख के बीच औसतन करीब 5.5 लाख बैरल प्रतिदिन डीजल निर्यात किया। यह भारत के कुल डीजल निर्यात का लगभग 78 प्रतिशत है।

रिलायंस के निर्यात में सितंबर की तुलना में करीब 12 प्रतिशत और पिछले साल अक्टूबर के मुकाबले लगभग 32.5 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। कंपनी का जामनगर रिफाइनिंग कॉम्प्लेक्स गुजरात में स्थित है और दुनिया की सबसे बड़ी एकल-स्थान रिफाइनिंग सुविधाओं में शामिल है।

इस कॉम्प्लेक्स की कुल रिफाइनिंग क्षमता करीब 68.2 मिलियन टन सालाना है, जिसमें से 35.2 मिलियन टन क्षमता निर्यात के लिए समर्पित बताई गई है। यही क्षमता कंपनी को वैश्विक बाजार में बड़े स्तर पर ईंधन भेजने में मदद करती है।

सरकारी रिफाइनरियों ने भी बढ़ाई निर्यात की रफ्तार

डीजल निर्यात में बढ़ोतरी केवल निजी कंपनियों तक सीमित नहीं रही। सार्वजनिक क्षेत्र की तेल रिफाइनरियों ने भी अक्टूबर में अपनी विदेशी सप्लाई बढ़ाई।

Kpler के आंकड़ों के अनुसार:

Indian Oil Corporation (IOC): निर्यात बढ़कर करीब 53,000 बैरल प्रतिदिन पहुंचा।

Mangalore Refinery and Petrochemicals Ltd (MRPL): सितंबर के करीब 1,000 बैरल प्रतिदिन से बढ़कर अक्टूबर में लगभग 38,000 बैरल प्रतिदिन।

Hindustan Petroleum Corporation (HPCL): निर्यात में करीब 16.3 प्रतिशत की बढ़ोतरी के साथ लगभग 26,000 बैरल प्रतिदिन।

इसके विपरीत, निजी कंपनी Nayara Energy का डीजल निर्यात सितंबर के मुकाबले करीब 42.4 प्रतिशत घटकर लगभग 40,000 बैरल प्रतिदिन रहा।

इन आंकड़ों से साफ है कि अक्टूबर में निर्यात की बढ़ोतरी में रिलायंस के साथ सरकारी रिफाइनरियों का योगदान भी बढ़ा है।

रूस और पश्चिम एशिया के संकट से भारत को मिला मौका

वैश्विक डीजल बाजार में आपूर्ति का दबाव बढ़ने के पीछे कई भू-राजनीतिक कारण हैं।

पश्चिम एशिया का संघर्ष: इस क्षेत्र में जारी तनाव के कारण कच्चे तेल और रिफाइंड ईंधन की आवाजाही प्रभावित हुई है। रिफाइनरियों और ऊर्जा ढांचे पर असर पड़ने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में डीजल की उपलब्धता पर दबाव बढ़ा है।

रूस की रिफाइनरियों पर हमले: यूक्रेन की ओर से रूसी ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर किए गए ड्रोन हमलों के कारण वहां की रिफाइनिंग क्षमता प्रभावित हुई। रूस दुनिया के प्रमुख डीजल निर्यातकों में शामिल है। उसकी आपूर्ति घटने से दूसरे देशों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में जगह बनी।

चीन की निर्यात पाबंदियां: चीन की ओर से घरेलू उपलब्धता को प्राथमिकता देते हुए रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात पर लगाए गए प्रतिबंधों ने भी बाजार में अतिरिक्त दबाव पैदा किया।

इन परिस्थितियों में भारत की रिफाइनरियों को एशिया, यूरोप, अफ्रीका और अमेरिका के बाजारों में अधिक ईंधन भेजने का अवसर मिला है। 

भारत बना दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा समुद्री डीजल निर्यातक

भारत की बढ़ती निर्यात क्षमता का एक बड़ा संकेत यह है कि देश इस साल समुद्र के रास्ते डीजल निर्यात करने वाले देशों में दूसरे स्थान पर पहुंच गया है। Reuters की 27 अक्टूबर की रिपोर्ट में Kpler के पोत-ट्रैकिंग आंकड़ों के आधार पर अमेरिका को पहले और भारत को दूसरे स्थान पर बताया गया है।

भारत के पास बड़े और आधुनिक रिफाइनिंग कॉम्प्लेक्स हैं, जो अलग-अलग प्रकार के कच्चे तेल को प्रोसेस कर सकते हैं। इससे कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय बाजार की मांग और कीमतों के अनुसार उत्पादन तथा निर्यात की रणनीति बदलने में मदद मिलती है।

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल उपभोक्ता और चौथा सबसे बड़ा रिफाइनर है। देश अपनी कच्चे तेल की जरूरत का 88 प्रतिशत से अधिक आयात करता है। ऐसे में रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात विदेशी मुद्रा अर्जित करने और तेल आयात से पड़ने वाले आर्थिक दबाव को कुछ हद तक संतुलित करने में मदद कर सकता है। 

डीजल निर्यात से भारत को कितना फायदा?

अंतरराष्ट्रीय बाजार में डीजल की कीमत और कच्चे तेल की कीमत के बीच का अंतर रिफाइनरियों के लिए महत्वपूर्ण होता है। इसे आम तौर पर डीजल क्रैक स्प्रेड या रिफाइनिंग मार्जिन कहा जाता है।

जब डीजल की कीमत कच्चे तेल की तुलना में तेजी से बढ़ती है, तो रिफाइनरियों को प्रति बैरल अधिक मार्जिन मिल सकता है। अक्टूबर में अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेहतर मार्जिन ने भारतीय कंपनियों को उत्पादन और निर्यात बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया।

इससे तीन प्रमुख फायदे हो सकते हैं:

निर्यात से विदेशी मुद्रा: अधिक पेट्रोलियम उत्पाद विदेश भेजने से निर्यात आय बढ़ सकती है।

रिफाइनरी कारोबार को लाभ: बेहतर मार्जिन से कंपनियों की रिफाइनिंग गतिविधियां अधिक लाभदायक हो सकती हैं।

तेल आयात बिल को आंशिक सहारा: रिफाइंड उत्पादों के निर्यात से कच्चे तेल के महंगे आयात का कुछ आर्थिक प्रभाव संतुलित हो सकता है।

हालांकि, निर्यात से होने वाली अतिरिक्त कमाई देश के बढ़ते कच्चे तेल आयात बिल को पूरी तरह खत्म नहीं कर सकती। इसका वास्तविक लाभ अंतरराष्ट्रीय कीमतों, कच्चे तेल की लागत, निर्यात शुल्क और घरेलू मांग पर निर्भर करेगा। 

क्या भारत में डीजल की कमी या कीमतों में बढ़ोतरी होगी?

निर्यात बढ़ने की खबर के बाद आम उपभोक्ताओं के मन में यह सवाल उठ सकता है कि क्या भारत में डीजल की उपलब्धता प्रभावित होगी?

फिलहाल केवल निर्यात बढ़ने के आंकड़े से देश में डीजल की कमी या कीमतों में बढ़ोतरी का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। भारत में घरेलू मांग को प्राथमिकता देना सरकारी नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियां मुख्य रूप से घरेलू बाजार की जरूरतों को पूरा करने पर ध्यान देती हैं।

Kpler के विशेषज्ञों के अनुसार, देश में परिवहन, माल ढुलाई, कृषि गतिविधियों, निर्माण और औद्योगिक क्षेत्र में डीजल की मांग मजबूत बनी हुई है। त्योहारों के मौसम में भी खपत को समर्थन मिल सकता है। इसलिए घरेलू मांग बढ़ने पर निर्यात के लिए उपलब्ध अतिरिक्त मात्रा सीमित हो सकती है। 

2027 में और बढ़ सकती है भारत की निर्यात क्षमता

भारत की डीजल निर्यात क्षमता आने वाले वर्षों में और बढ़ने की संभावना है। Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक, सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियां 2027 में अपनी रिफाइनिंग क्षमता बढ़ाने की योजना पर काम कर रही हैं।

सरकारी रिफाइनरियों की ओर से अगले साल कुल मिलाकर करीब 16.5 मिलियन टन सालाना अतिरिक्त डीजल उत्पादन क्षमता जोड़ने की योजना बताई गई है। इसमें IOC, HPCL, BPCL और Numaligarh Refinery की विस्तार योजनाएं शामिल हैं।

पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने भी कहा है कि भारत का लक्ष्य केवल अपनी घरेलू जरूरतों को पूरा करना नहीं, बल्कि दुनिया को ईंधन की आपूर्ति करने वाला बड़ा रिफाइनिंग केंद्र बनना है।

यदि ये विस्तार योजनाएं तय समय पर पूरी होती हैं, तो भारत की वैश्विक डीजल बाजार में भूमिका और मजबूत हो सकती है। 

निष्कर्ष

अक्टूबर 2026 में भारत का डीजल निर्यात 7.1 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंचना देश की रिफाइनिंग क्षमता और वैश्विक ऊर्जा बाजार में बढ़ती भूमिका का महत्वपूर्ण संकेत है। पश्चिम एशिया और रूस से आपूर्ति प्रभावित होने के बीच भारतीय रिफाइनरियों ने बेहतर अंतरराष्ट्रीय मार्जिन का फायदा उठाया। रिलायंस इंडस्ट्रीज सबसे बड़ी निर्यातक रही, जबकि IOC, MRPL और HPCL ने भी अपनी हिस्सेदारी बढ़ाई। हालांकि, भविष्य में निर्यात की रफ्तार घरेलू डीजल मांग, कच्चे तेल की कीमतों और वैश्विक सप्लाई की स्थिति पर निर्भर करेगी।