सऊदी अरब में लगातार बढ़ते सुरक्षा संकट के बीच अमेरिका ने बड़ा कदम उठाया है। अमेरिकी विदेश विभाग ने सऊदी अरब में तैनात गैर-आपातकालीन अमेरिकी सरकारी कर्मचारियों और उनके परिवारों को देश छोड़ने का आदेश दिया है। यह फैसला ऐसे समय आया है जब सऊदी अरब के नागरिक हवाई अड्डों और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को निशाना बनाकर लगातार हमलों की खबरें सामने आ रही हैं।
अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ता टॉमी पिगॉट ने स्पष्ट किया कि आदेश फिलहाल सऊदी अरब में मौजूद गैर-आपातकालीन अमेरिकी सरकारी कर्मचारियों और उनके परिवारों पर लागू है। उन्होंने सुरक्षा को विभाग की सर्वोच्च प्राथमिकता बताया और कहा कि हालात को देखते हुए कर्मचारियों की सुरक्षा के लिए जरूरी कदम उठाए जा रहे हैं।
यह फैसला केवल सामान्य यात्रा सलाह नहीं है, बल्कि अमेरिकी विदेश विभाग की भाषा में “Ordered Departure” एक गंभीर सुरक्षा कदम है। इसका अर्थ है कि निर्धारित श्रेणी के कर्मचारियों और उनके परिवारों को मिशन से हटने का निर्देश दिया गया है, जबकि जरूरी राजनयिक और आपातकालीन काम सीमित स्टाफ के साथ जारी रह सकते हैं।
आखिर क्यों लिया अमेरिका ने यह फैसला?
अमेरिका का यह कदम सऊदी अरब में हूती हमलों के बढ़ते खतरे के बीच आया है। अमेरिकी विदेश विभाग के अनुसार, ईरान समर्थित हूती समूह ने सऊदी अरब के खिलाफ गतिविधियां तेज की हैं और नागरिक हवाई अड्डों तथा महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को निशाना बनाया है।
अमेरिका ने चेतावनी दी है कि मौजूदा शत्रुता तेजी से और व्यापक क्षेत्र में फैल सकती है। यही कारण है कि सऊदी अरब में अमेरिकी मिशन की सुरक्षा को लेकर अतिरिक्त सावधानी बरती जा रही है।
डम्माम एयरपोर्ट हमले के बाद बढ़ी चिंता
अमेरिकी फैसले की टाइमिंग इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 21 अक्टूबर को सऊदी अरब के डम्माम स्थित किंग फहद इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर हमला हुआ था।
सऊदी अधिकारियों के अनुसार, इस हमले में दो लोगों की मौत हुई और आठ लोग घायल हुए। मृतकों में एक भारतीय नागरिक भी शामिल था। भारतीय अधिकारियों ने भी एक भारतीय की मौत और दो अन्य भारतीय नागरिकों के घायल होने की पुष्टि की थी।
इसी दौरान सऊदी अरब के शायबा तेल क्षेत्र पर भी ड्रोन हमले से जुड़ी घटना सामने आई, जिसमें ड्रोन को रोकने के बाद गिरा मलबा जानलेवा साबित हुआ। इन घटनाओं ने सऊदी अरब के महत्वपूर्ण ऊर्जा और परिवहन ढांचे की सुरक्षा को लेकर चिंता और बढ़ा दी है।
अमेरिकी दूतावास पहले से सीमित स्टाफ के साथ काम कर रहा
अमेरिकी दूतावास, रियाद की स्थिति भी सामान्य नहीं है। रिपोर्टों के अनुसार, दूतावास पहले हुए क्षेत्रीय संघर्ष के दौरान क्षतिग्रस्त हुआ था और पिछले कुछ समय से सीमित स्टाफ के साथ काम कर रहा था।
हाल के महीनों में कुछ अमेरिकी राजनयिक कर्मचारी वापस सऊदी अरब लौटे थे, लेकिन अब नए सुरक्षा आदेश के कारण गैर-जरूरी कर्मचारियों और उनके परिवारों को वापस भेजने का फैसला किया गया है।
इससे संकेत मिलता है कि वॉशिंगटन फिलहाल सऊदी अरब में अपने राजनयिक मिशन की मौजूदगी को पूरी तरह खत्म नहीं कर रहा, बल्कि जोखिम वाले और गैर-जरूरी स्टाफ की संख्या कम कर रहा है।
क्या पूरे खाड़ी क्षेत्र से अमेरिकी राजनयिक हटेंगे?
इस मामले में एक महत्वपूर्ण बात सामने आई है। शुरुआती रिपोर्टों में यह बताया गया था कि अमेरिका खाड़ी के कई देशों से अपने राजनयिक कर्मचारियों और उनके परिवारों को हटाने की तैयारी कर रहा है।
लेकिन अमेरिकी विदेश विभाग ने बाद में स्पष्ट किया कि औपचारिक Ordered Departure केवल सऊदी अरब के लिए जारी किया गया है। खाड़ी के अन्य देशों में अमेरिकी मिशनों के संचालन पर अलग सुरक्षा प्रतिबंध और स्टाफिंग बदलाव हो सकते हैं, लेकिन उन्हें सऊदी अरब वाले आदेश के बराबर नहीं माना जाना चाहिए।
यानी फिलहाल इसे “पूरे खाड़ी क्षेत्र से अमेरिकी राजनयिकों की वापसी” कहना सही नहीं होगा।
अमेरिकी नागरिकों के लिए भी सुरक्षा चेतावनी
सऊदी अरब में अमेरिकी नागरिकों को भी सुरक्षा स्थिति पर नजर रखने की सलाह दी गई है। अमेरिकी मिशन ने चेतावनी दी है कि मौजूदा शत्रुता आगे और बढ़ सकती है।
अमेरिकी सरकारी कर्मचारियों के लिए सऊदी अरब के हवाई अड्डों के इस्तेमाल पर भी अतिरिक्त अनुमति की व्यवस्था लागू की गई है। इसका सीधा असर अमेरिकी कर्मचारियों की आवाजाही और राजनयिक गतिविधियों पर पड़ सकता है।
रियाद और दूसरे शहरों पर भी नजर
सऊदी अरब में हाल के दिनों में रियाद के किंग खालिद इंटरनेशनल एयरपोर्ट को लेकर भी सुरक्षा संकट सामने आया है। रिपोर्टों के अनुसार, वहां हमलों के बाद हवाई संचालन प्रभावित हुआ और कई अंतरराष्ट्रीय एयरलाइनों ने अपनी सेवाओं में बदलाव किया।
डम्माम एयरपोर्ट पर हुए हमले और ऊर्जा प्रतिष्ठानों से जुड़ी घटनाओं ने यह चिंता बढ़ाई है कि हमलों का दायरा केवल सैन्य ठिकानों तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि नागरिक और आर्थिक बुनियादी ढांचा भी जोखिम में आ सकता है।
क्या इसका असर भारत पर भी पड़ सकता है?
सऊदी अरब में बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक रहते और काम करते हैं। ऐसे में वहां सुरक्षा स्थिति बिगड़ने का असर भारतीय समुदाय और क्षेत्रीय यात्रा पर भी पड़ सकता है।
डम्माम एयरपोर्ट हमले में एक भारतीय नागरिक की मौत और दो भारतीय नागरिकों के घायल होने की पुष्टि पहले ही हो चुकी है। इसके अलावा शायबा तेल क्षेत्र की घटना में भी एक भारतीय नागरिक के घायल होने की जानकारी सामने आई थी।
इस वजह से भारत भी सऊदी अरब की सुरक्षा स्थिति पर करीबी नजर रख रहा है, खासकर भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को लेकर।
क्या यह क्षेत्रीय युद्ध के विस्तार का संकेत है?
अमेरिका का यह कदम ऐसे समय आया है जब यमन में हूती गतिविधियों और सऊदी अरब के खिलाफ हमलों को लेकर तनाव बढ़ा हुआ है। अमेरिकी अधिकारियों का आकलन है कि स्थिति तेजी से बिगड़ सकती है।
हालांकि, अमेरिका के इस फैसले को सीधे तौर पर किसी नए व्यापक युद्ध की घोषणा या अमेरिकी सैन्य कार्रवाई की शुरुआत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। फिलहाल यह मुख्य रूप से कर्मचारियों और उनके परिवारों की सुरक्षा से जुड़ा एहतियाती कदम है।
फिर भी, अमेरिकी राजनयिक मिशन में गैर-आपातकालीन स्टाफ की संख्या कम करने का फैसला क्षेत्र की गंभीर सुरक्षा स्थिति का स्पष्ट संकेत जरूर देता है।
आगे क्या होगा?
अब सबसे ज्यादा नजर सऊदी अरब में हमलों की अगली कड़ी और अमेरिकी सुरक्षा आकलन पर रहेगी। अगर हमले बढ़ते हैं या नए क्षेत्रों तक फैलते हैं तो अमेरिका अपने कर्मचारियों की मौजूदगी और मिशन के संचालन को लेकर अतिरिक्त सुरक्षा कदम उठा सकता है।
फिलहाल वॉशिंगटन का संदेश साफ है—सऊदी अरब में सुरक्षा जोखिम को हल्के में नहीं लिया जा रहा और अमेरिकी नागरिकों तथा सरकारी कर्मचारियों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जा रही है।