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UN में भारत का पाकिस्तान पर करारा पलटवार, Kargil में अपने ही सैनिकों के शव न लेने की याद दिलाई

भारत ने कहा—1999 में पाकिस्तान ने अपने मारे गए सैनिकों को स्वीकार नहीं किया, जबकि भारतीय सेना ने कई पाकिस्तानी सैनिकों को सैन्य सम्मान और इस्लामी रीति से दफनाया

UN में भारत का पाकिस्तान पर करारा पलटवार, Kargil में अपने ही सैनिकों के शव न लेने की याद दिलाई
प्रतीकात्मक तस्वीर, AI से बनाई गई। यह वास्तविक घटना का चित्रण नहीं है।

UN में फिर आमने-सामने भारत और पाकिस्तान

भारत और पाकिस्तान के बीच कूटनीतिक तनातनी का एक और तीखा दृश्य संयुक्त राष्ट्र (UN) में देखने को मिला। भारत ने पाकिस्तान के धार्मिक स्वतंत्रता, अल्पसंख्यकों और burial rights से जुड़े बयानों का जवाब देते हुए 1999 के Kargil War की घटना को अंतरराष्ट्रीय मंच पर सामने रखा।

संयुक्त राष्ट्र में भारत की First Secretary Bhavika Mangalanandan ने कहा कि यह विडंबना है कि पाकिस्तान धार्मिक स्वतंत्रता और अंतिम संस्कार के अधिकारों पर भारत को उपदेश देता है, जबकि Kargil युद्ध के दौरान उसने अपने मारे गए सैनिकों के शवों को स्वीकार तक नहीं किया था।

भारत ने याद दिलाया कि उस समय भारतीय सेना ने कई पाकिस्तानी सैनिकों के शवों को सैन्य सम्मान के साथ और इस्लामी रीति-रिवाजों के अनुसार दफनाया था।

Kargil War का वो अध्याय जिसे भारत ने UN में फिर उठाया

भारत का ताजा हमला सीधे 1999 के Kargil संघर्ष की उस घटना पर केंद्रित था, जब पाकिस्तान ने लंबे समय तक यह स्वीकार नहीं किया था कि Kargil की ऊंची चोटियों पर लड़ने वाले सभी लोग केवल “मुझाहिदीन” थे।

भारतीय पक्ष के अनुसार, संघर्ष के दौरान मारे गए पाकिस्तानी सैनिकों के शवों को भारतीय सेना ने बरामद किया था। जब पाकिस्तान ने उन्हें अपने सैनिकों के रूप में स्वीकार करने से इनकार किया, तब भारतीय सेना ने उनमें से कई को सम्मानपूर्वक दफनाया और Islamic rites का पालन किया।

इसी इतिहास का हवाला देते हुए भारत ने पाकिस्तान के मौजूदा धार्मिक स्वतंत्रता संबंधी बयानों पर सवाल उठाया।

Bhavika Mangalanandan ने UN में कहा कि ऐसा देश, जिसने अपने ही सैनिकों के शव स्वीकार नहीं किए, उसे faith, religious freedom और burial rights पर भारत को उपदेश देने से पहले अपने रिकॉर्ड पर ध्यान देना चाहिए।

मामला सिर्फ Kargil तक सीमित नहीं था

भारत का बयान केवल 1999 के युद्ध की याद दिलाने तक सीमित नहीं रहा। भारतीय प्रतिनिधि ने पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों की स्थिति और उसके भारत पर लगाए जाने वाले आरोपों को भी निशाना बनाया।

भारत ने कहा कि पाकिस्तान को जम्मू-कश्मीर को लेकर लगातार चिंता जताने के बजाय अपने नियंत्रण वाले क्षेत्रों में मानवाधिकार और अल्पसंख्यकों की स्थिति पर ध्यान देना चाहिए।

भारतीय प्रतिनिधि ने विशेष रूप से Rawalakot का उल्लेख किया और पाकिस्तान से कहा कि वह जम्मू-कश्मीर के भारतीय केंद्रशासित प्रदेश पर टिप्पणी करने के बजाय अपने कब्जे वाले क्षेत्रों में हो रहे घटनाक्रम पर ध्यान दे।

भारत ने यह भी कहा कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के अधिकारों के उल्लंघन के आरोप लगातार सामने आते रहे हैं और ऐसे रिकॉर्ड के बावजूद भारत को धार्मिक स्वतंत्रता पर भाषण देना उचित नहीं है।

UN में विवाद की शुरुआत कैसे हुई?

भारत का यह जवाब UN Special Rapporteur on Freedom of Religion or Belief Nazila Ghanea की एक interim report पर चर्चा के दौरान आया।

रिपोर्ट में जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा अभियानों के दौरान मारे गए लोगों के funeral rights, शव परिवारों को लौटाने और burial practices को लेकर गंभीर चिंताएं व्यक्त की गई थीं। रिपोर्ट में कहा गया कि ऐसे आरोप विशेष रूप से मुस्लिम समुदाय को प्रभावित करने वाले बताए गए हैं।

भारत ने इस रिपोर्ट के कुछ निष्कर्षों और उसके दृष्टिकोण पर सवाल उठाया।

भारतीय प्रतिनिधि ने कहा कि रिपोर्ट में COVID-19 के दौरान कथित भेदभाव की चर्चा करते समय Global South पर अधिक ध्यान दिया गया, जबकि विकसित देशों में हुई समान त्रासदियों का पर्याप्त उल्लेख नहीं किया गया।

भारत ने आतंकवादियों के funeral rights का मुद्दा भी उठाया

UN की चर्चा में भारत ने एक और संवेदनशील मुद्दा उठाया—आतंकवादियों के funeral rights।

भारतीय प्रतिनिधि ने सवाल किया कि जिन लोगों ने आतंकवादी हिंसा के जरिए निर्दोष लोगों की जान ली, उनके अंतिम संस्कार के अधिकारों की बात करते समय आतंकवाद के पीड़ितों के अधिकारों को भी उतना ही महत्व क्यों नहीं दिया जाता।

भारत का तर्क था कि किसी भी राज्य द्वारा funeral rights पर प्रतिबंध लगाए जाने की स्थिति में कानूनी सीमाओं और संप्रभु अधिकारों को ध्यान में रखा जाना चाहिए।

इस बयान ने UN की चर्चा को केवल भारत-पाकिस्तान विवाद तक सीमित नहीं रखा, बल्कि मानवाधिकार, आतंकवाद और अंतिम संस्कार के अधिकारों के व्यापक सवाल से जोड़ दिया।

भारत ने पाकिस्तान के Kashmir narrative को भी चुनौती दी

UN में भारत ने पाकिस्तान के लगातार Jammu & Kashmir मुद्दा उठाने पर भी आपत्ति जताई।

भारतीय प्रतिनिधि ने कहा कि पाकिस्तान का भारत के जम्मू-कश्मीर पर “obsession” खत्म होना चाहिए और उसे अपने नियंत्रण वाले क्षेत्रों में हो रहे घटनाक्रम पर ध्यान देना चाहिए।

भारत ने खास तौर पर Rawalakot का उल्लेख करते हुए कहा कि पाकिस्तान को वहां की परिस्थितियों और अपने नागरिकों के अधिकारों पर ध्यान देना चाहिए।

यह बयान ऐसे समय आया है जब दोनों देश अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जम्मू-कश्मीर, आतंकवाद और मानवाधिकारों को लेकर लगातार एक-दूसरे के खिलाफ आरोप लगाते रहे हैं।

Kargil का जिक्र क्यों अहम है?

भारत के ताजा बयान में Kargil War का उल्लेख इसलिए खास है क्योंकि यह घटना भारत-पाकिस्तान संबंधों के इतिहास में सबसे संवेदनशील सैन्य अध्यायों में से एक है।

1999 में Kargil की ऊंची पहाड़ियों पर भारतीय और पाकिस्तानी सैनिकों के बीच युद्ध हुआ था। भारत का कहना है कि पाकिस्तान ने शुरुआत में अपने नियमित सैनिकों की भूमिका को स्वीकार नहीं किया और उन्हें अलग पहचान देने की कोशिश की।

युद्ध के दौरान मारे गए पाकिस्तानी सैनिकों के शवों को भारतीय सेना द्वारा सम्मानपूर्वक दफनाने का मुद्दा पहले भी भारत की ओर से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाया जाता रहा है।

अब 27 साल बाद, यही घटना फिर UN की बहस में सामने आई है—लेकिन इस बार संदर्भ religious freedom और burial rights का था।

भारत का संदेश साफ—पहले अपना रिकॉर्ड देखे पाकिस्तान

भारत के बयान का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश यही था कि पाकिस्तान को भारत के खिलाफ मानवाधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता के आरोप लगाने से पहले अपने रिकॉर्ड पर नजर डालनी चाहिए।

भारत ने Kargil का उदाहरण देकर यह तर्क रखा कि भारतीय सेना ने युद्ध के दौरान मारे गए पाकिस्तानी सैनिकों के साथ भी सम्मान और धार्मिक रीति-रिवाजों का पालन किया था।

वहीं भारत ने पाकिस्तान के भीतर अल्पसंख्यकों की स्थिति को लेकर भी सवाल उठाए और कहा कि जो देश अपने अल्पसंख्यकों के अधिकारों की पर्याप्त रक्षा नहीं कर पाता, उसे भारत को इस मुद्दे पर lecture नहीं देना चाहिए।

अब आगे क्या?

इस बयान के बाद भारत-पाकिस्तान के बीच UN diplomatic exchanges और तेज होने की संभावना है। दोनों देश लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र के मंच का इस्तेमाल एक-दूसरे के खिलाफ अपने पक्ष को रखने के लिए करते रहे हैं।

भारत के लिए यह बयान दोहरे संदेश वाला है—एक तरफ Kargil के ऐतिहासिक रिकॉर्ड को सामने रखना और दूसरी तरफ पाकिस्तान के Kashmir तथा minority-rights narrative को चुनौती देना।

फिलहाल इस पूरे घटनाक्रम का सबसे अहम पहलू यही है कि Kargil War का 27 साल पुराना अध्याय एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र के मंच पर भारत-पाकिस्तान की कूटनीतिक बहस का हिस्सा बन गया है।