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छत्तीसगढ़ धर्म स्वतंत्रता अधिनियम 2026 को हाईकोर्ट में चुनौती

सरकार को तीन सप्ताह में जवाब देने का आदेश, याचिकाकर्ताओं ने कहा कि नियम मौलिक अधिकारों का हनन करते हैं।

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच में याचिका की सुनवाई का दृश्य।
प्रतीकात्मक तस्वीर, AI से बनाई गई। यह वास्तविक घटना का चित्रण नहीं है।

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय की डिवीजन बेंच ने गुरुवार को धर्म स्वतंत्रता अधिनियम 2026 की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई की। मुख्य न्यायाधीश कृष्ण राम मोहपात्रा और न्यायमूर्ति संतोष शर्मा की पीठ ने सरकार को तीन सप्ताह में जवाब देने का आदेश दिया।

याचिका वीएन प्रसाद राव और अन्य की ओर से अधिवक्ता हर्षमंदर रस्तोगी ने दाखिल की है। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ एस मुरलीधर और मनोज पारंजपे ने वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए दलीलें दीं।

मौलिक अधिकारों का हनन

वकीलों ने कहा कि यह नया अधिनियम नागरिकों के धार्मिक अधिकार, अंतःकरण की स्वतंत्रता और निजता का सीधा उल्लंघन करता है। किसी का धर्म उसकी निजी गरिमा का हिस्सा है और इसे सार्वजनिक घोषणा या सरकारी अनुमति के अधीन नहीं किया जा सकता।

जटिल प्रशासनिक प्रक्रिया

अधिनियम के तहत स्वैच्छिक धर्मांतरण के लिए भी कई शर्तें हैं। यदि कोई व्यक्ति धर्म बदलना चाहे तो उसे सार्वजनिक घोषणा करनी होगी और विभिन्न सरकारी विभागों से अनुमति लेनी होगी। यह पूरी प्रक्रिया कम से कम 200 दिन का समय लेती है।

धर्मांतरण कराने वाले किसी भी धार्मिक व्यक्ति को सरकार के पास अपना पंजीकरण अनिवार्य रूप से कराना पड़ता है।

कठोर दंड का प्रावधान

कानून में धर्मांतरण के लिए गंभीर सजा दी गई है। नियमों की जटिलता के कारण स्वैच्छिक धर्मांतरण के मामले में भी लोगों को आरोपी बनाया जा सकता है। सजा में सात साल से लेकर आजीवन कारावास के साथ 10 लाख रुपये तक का जुर्माना शामिल है।

याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि अस्पष्ट कानूनी प्रावधानों के कारण धार्मिक स्थलों को गैरकानूनी तरीके से बंद किया जा रहा है। इससे लोग अपनी आस्था के अनुसार स्वतंत्र पूजा-अर्चना से वंचित हो रहे हैं।

अदालत ने याचिका पर अंतरिम राहत देने से पहले सरकार का पक्ष सुनने का निर्णय किया है। राज्य सरकार को अपनी दलीलें तीन सप्ताह में दाखिल करनी होंगी।