अदालत ने किन कमियों पर सवाल उठाए?
हाईकोर्ट के सामने पेश रिकॉर्ड में कथित गतिविधियों और संपर्कों की पर्याप्त जानकारी नहीं दी गई थी। अदालत ने विशेष रूप से पाया कि:
- कथित बातचीत की तारीखें स्पष्ट नहीं थीं।
- यह नहीं बताया गया था कि ऐप के जरिए वास्तव में किस तरह की जानकारी साझा की गई।
- सुरक्षा बलों की गतिविधियों से जुड़ी सूचना भेजने के आरोप के समर्थन में पर्याप्त विवरण नहीं था।
- जिला मजिस्ट्रेट ने पुलिस की रिपोर्ट पर स्वतंत्र रूप से विचार करने के बजाय उसके आरोपों को काफी हद तक दोहराया था।
अदालत ने क्या आदेश दिया?
न्यायमूर्ति वसीम सादिक नरगल ने 30 अक्टूबर 2026 के आदेश में PSA के तहत जारी हिरासत आदेश रद्द कर दिया। अदालत ने निर्देश दिया कि संबंधित व्यक्ति को तत्काल रिहा किया जाए, बशर्ते वह किसी अन्य मामले में हिरासत में रखने के लिए आवश्यक न हो।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि जांच एजेंसी के पास आतंकवादी गतिविधियों में संलिप्तता के ठोस इलेक्ट्रॉनिक या अन्य सबूत हैं, तो वह सामान्य आपराधिक कानून के तहत जांच और अभियोजन कर सकती है।
फैसले का व्यापक कानूनी महत्व
यह फैसला डिजिटल गोपनीयता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन के लिहाज से महत्वपूर्ण है। अदालत ने यह नहीं कहा कि एन्क्रिप्टेड ऐप का इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति जांच से बाहर है। उसका जोर इस बात पर था कि किसी व्यक्ति को केवल ऐप या VPN इस्तेमाल करने के आधार पर निवारक हिरासत में नहीं रखा जा सकता; इसके लिए ठोस सामग्री और कानून के अनुरूप प्रक्रिया जरूरी है।
PSA के तहत निवारक हिरासत एक असाधारण शक्ति है। इसका इस्तेमाल सामान्य आपराधिक जांच और मुकदमे की प्रक्रिया के विकल्प के रूप में नहीं किया जा सकता।