चार साल पुराने मामले में आया बड़ा फैसला
गाजियाबाद में सामने आए एक बेहद गंभीर दहेज हत्या मामले में अदालत ने पति और उसके माता-पिता को उम्रकैद की सजा सुनाई है। अतिरिक्त सत्र न्यायालय ने सिद्धार्थ विहार निवासी आकाश त्यागी, उसके पिता सुरेश और मां उषा को महिला की हत्या, दहेज उत्पीड़न और सबूत मिटाने से जुड़े अपराधों में दोषी माना।
यह मामला वर्ष 2022 का है, जब 22 वर्षीय रिया जैन अचानक लापता हो गई थीं। परिवार की शिकायत के बाद पुलिस जांच शुरू हुई और बाद में उनका शव बरामद हुआ। जांच में सामने आए तथ्यों ने मामले को साधारण गुमशुदगी से एक बेहद गंभीर हत्या के मामले में बदल दिया।
लापता होने के बाद सामने आया हत्या का मामला
पुलिस के मुताबिक, रिया के लापता होने के बाद उनके परिवार ने उनके ससुराल पक्ष पर सवाल उठाए थे। परिवार ने आरोप लगाया था कि शादी के बाद से ही ₹1 लाख दहेज की मांग को लेकर रिया को परेशान किया जा रहा था।
जांच के दौरान पुलिस को पता चला कि रिया को कथित तौर पर एक अल्ट्रासाउंड सेंटर ले जाने की बात कही गई थी। पति आकाश ने शुरुआत में पुलिस को बताया था कि रिया और उसकी मां उषा का कुछ लोगों ने अपहरण कर लिया था।
हालांकि, जांच आगे बढ़ने पर पुलिस को इस कहानी और सामने आए दूसरे साक्ष्यों के बीच कई विसंगतियां मिलीं। अदालत ने भी आरोपी पति के अपहरण वाले दावे को अन्य स्थापित तथ्यों के साथ असंगत पाया।
शव की हालत ने जांच को दिया नया मोड़
मामले की जांच के दौरान पुलिस ने शाहजहांपुर जंगल क्षेत्र से रिया का शव बरामद किया। रिपोर्ट के मुताबिक, शव का सिर अलग था और दोनों हथेलियां भी काटी गई थीं। पुलिस का आरोप था कि ऐसा रिया की पहचान छिपाने और सबूत मिटाने के उद्देश्य से किया गया।
जांच के दौरान पुलिस ने कथित अपराध में इस्तेमाल एक डैगर, खून लगे कपड़े और अन्य महत्वपूर्ण साक्ष्य बरामद किए। पुलिस के मुताबिक, हथियार पर मानव रक्त के निशान भी मिले थे।
यह बरामदगी मामले की जांच में महत्वपूर्ण कड़ी बनी क्योंकि इससे पुलिस को आरोपियों की भूमिका को लेकर आगे बढ़ने में मदद मिली।
DNA रिपोर्ट ने जोड़ी साक्ष्यों की कड़ी
मामले में DNA evidence भी अहम रहा। अभियोजन पक्ष ने अदालत के सामने बताया कि बरामद शव से संबंधित जैविक साक्ष्यों की जांच में DNA प्रोफाइल रिया जैन से मेल खाई।
अदालत ने केवल एक साक्ष्य के आधार पर फैसला नहीं किया। उसके सामने DNA रिपोर्ट, हथियार की बरामदगी, फोन से जुड़े साक्ष्य, कपड़ों से मिले जैविक नमूने और आरोपियों के बयानों में विरोधाभास समेत कई परिस्थितिजन्य साक्ष्य रखे गए।
अदालत ने इन सभी परिस्थितियों को एक साथ देखते हुए माना कि साक्ष्यों की एक ऐसी कड़ी बनती है जो आरोपियों की भूमिका को स्थापित करती है।
दहेज की मांग भी जांच में सामने आई
अभियोजन पक्ष के अनुसार रिया की शादी मार्च 2021 में हुई थी। परिवार का आरोप था कि शादी के बाद से ही ससुराल पक्ष की ओर से दहेज को लेकर दबाव बनाया जा रहा था।
परिवार ने कथित तौर पर ₹1 लाख की अतिरिक्त दहेज मांग का आरोप लगाया था। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर दहेज मांग से जुड़े आरोप को भी मामले की परिस्थितियों में महत्वपूर्ण माना।
यही पहलू मामले को केवल हत्या तक सीमित नहीं रखता, बल्कि इसे दहेज उत्पीड़न और दहेज से जुड़ी हिंसा के व्यापक संदर्भ से भी जोड़ता है।
पति की कहानी पर अदालत ने क्यों नहीं किया भरोसा?
आकाश त्यागी की ओर से यह दावा किया गया था कि रिया और उसकी मां का कुछ लोगों ने अपहरण किया था। लेकिन अदालत ने जांच में सामने आए दूसरे तथ्यों के साथ इस दावे को मिलाकर देखा।
अदालत के सामने यह तथ्य आया कि रिया आरोपी के साथ अल्ट्रासाउंड सेंटर गई थीं और उसके बाद लापता हुईं। वहीं, शव और कथित हत्या में इस्तेमाल हथियार की बरामदगी ने जांच को दूसरी दिशा दी।
अदालत ने आरोपी के अपहरण संबंधी दावे को स्थापित साक्ष्यों के साथ असंगत पाया। इसके अलावा DNA और अन्य फोरेंसिक साक्ष्यों ने अभियोजन की कहानी को मजबूत किया।
सबूत मिटाने के आरोप में भी सजा
अदालत ने तीनों को हत्या और दहेज उत्पीड़न के साथ-साथ सबूत मिटाने से संबंधित अपराध में भी दोषी माना।
रिपोर्ट के अनुसार, तीनों को IPC की धारा 302 सहपठित धारा 34 के तहत उम्रकैद और जुर्माने की सजा दी गई। इसके अलावा IPC की धारा 201 और Dowry Prohibition Act की संबंधित धारा के तहत भी जुर्माना लगाया गया।
रिपोर्ट के अनुसार, प्रत्येक दोषी पर कुल ₹36,000 का जुर्माना लगाया गया। अदालत ने अलग-अलग धाराओं की सजाओं को साथ-साथ चलाने का निर्देश दिया।
अदालत ने अपराध की गंभीरता को माना महत्वपूर्ण
फैसले में अदालत ने अपराध की प्रकृति, परिस्थितियों, पीड़िता पर पड़े प्रभाव और समाज पर इसके प्रभाव को ध्यान में रखा।
अदालत ने माना कि उपलब्ध साक्ष्यों से आरोपियों की भूमिका के बारे में परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूरी कड़ी स्थापित होती है।
इस मामले में खास बात यह रही कि अभियोजन के पास किसी एक प्रत्यक्षदर्शी पर निर्भर रहने के बजाय फोरेंसिक और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों का संयोजन था। यही साक्ष्य अदालत के सामने आरोपी पक्ष की कहानी की विश्वसनीयता को चुनौती देने में महत्वपूर्ण साबित हुए।
दहेज हत्या के मामलों में अदालत का सख्त रुख
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब अदालतें दहेज से जुड़ी हिंसा के मामलों में साक्ष्यों और आरोपों की गंभीरता पर लगातार जोर दे रही हैं।
हालांकि, हर दहेज मृत्यु मामले में सीधे उम्रकैद देना कानून का स्वतः नियम नहीं है। हाल ही में इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने भी कहा था कि dowry death के मामले में उम्रकैद अधिकतम सजा है और इसे हर मामले में स्वतः नहीं दिया जा सकता; सजा अपराध की गंभीरता और प्रत्येक आरोपी की भूमिका के अनुरूप होनी चाहिए।
गाजियाबाद के इस मामले में अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और अपराध की गंभीर परिस्थितियों को देखते हुए उम्रकैद को उचित माना।
फैसले का संदेश
रिया जैन मामले का फैसला केवल एक परिवार के लिए न्यायिक निर्णय नहीं है, बल्कि यह दिखाता है कि गंभीर अपराधों में DNA, हथियार की बरामदगी, डिजिटल/भौतिक साक्ष्य और परिस्थितिजन्य घटनाक्रम मिलकर अभियोजन का मजबूत आधार बन सकते हैं।
मामले में अदालत ने आरोपियों के खिलाफ उपलब्ध साक्ष्यों की पूरी श्रृंखला पर विचार करने के बाद दोषसिद्धि की। करीब चार साल बाद आया यह फैसला अब दहेज से जुड़ी हिंसा और महिलाओं की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल सामने रखता है।