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डूबने से मौत को सिर्फ हादसा मानना ठीक नहीं, SC ने हत्या की जांच को दी हरी झंडी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा—पोस्टमार्टम में drowning सामने आने से foul play अपने आप खत्म नहीं होता; लड़के को आखिरी बार आरोपी के साथ देखा गया था और आरोपी के मौके से भागने की बात भी सामने आई

डूबने से मौत को सिर्फ हादसा मानना ठीक नहीं, SC ने हत्या की जांच को दी हरी झंडी
प्रतीकात्मक तस्वीर, AI से बनाई गई। यह वास्तविक घटना का चित्रण नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने डूबने से हुई एक लड़के की मौत के मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए हत्या की कार्यवाही फिर से बहाल कर दी है। अदालत ने साफ किया कि अगर पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण drowning यानी डूबना बताया गया हो, तो सिर्फ इसी आधार पर मौत को दुर्घटना मानकर हत्या या foul play की संभावना को खारिज नहीं किया जा सकता।

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने पटना हाई कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें आरोपी के खिलाफ IPC की धारा 302 (हत्या) और धारा 201 (सबूत मिटाने) के तहत शुरू हुई कार्यवाही को खत्म कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि उपलब्ध परिस्थितियां ऐसी थीं जिनकी जांच ट्रायल के दौरान साक्ष्यों के आधार पर होनी चाहिए।

मामला आखिर क्या था?

यह मामला बिहार का है और मृतक के पिता मृत्युंजय कुमार चौधरी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। उनका आरोप था कि उनके बेटे को आरोपी अपने साथ लेकर गया था और कुछ समय बाद उसके डूबने की सूचना सामने आई।

घटना के बाद पुलिस जांच और न्यायिक प्रक्रिया में मामला आगे बढ़ा। एक समय पुलिस की closure report के आधार पर कार्यवाही समाप्त होने की स्थिति बनी, लेकिन मृतक के पिता ने इसका विरोध किया।

बाद की न्यायिक प्रक्रिया में मजिस्ट्रेट ने उपलब्ध सामग्री के आधार पर आरोपी के खिलाफ संज्ञान लिया। हालांकि, पटना हाई कोर्ट ने इस कार्यवाही को रद्द कर दिया था। इसके बाद पिता ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

‘पोस्टमार्टम में drowning है, इसलिए हत्या नहीं’—SC ने क्यों नकारा?

इस केस का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी पहलू यही था।

पटना हाई कोर्ट ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट में asphyxia और ventricular fibrillation due to drowning का उल्लेख देखते हुए माना था कि मौत में कोई स्पष्ट आपराधिक पहलू नहीं दिखता।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।

अदालत ने समझाया कि अगर किसी व्यक्ति को जानबूझकर पानी में धकेला जाए और उसका उद्देश्य उसे डुबाकर मारना हो, तब भी पोस्टमार्टम में मौत का कारण drowning ही सामने आ सकता है। इसलिए मेडिकल रिपोर्ट यह बताती है कि व्यक्ति की मृत्यु किस प्रकार हुई, लेकिन हर मामले में यह अपने आप तय नहीं करती कि वह डूबना दुर्घटना था या किसी ने उसे डुबाया था।

यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मौत के आसपास की परिस्थितियों की भी जांच जरूरी है।

आरोपी के मौके से भागने की बात भी बनी अहम कड़ी

सुप्रीम कोर्ट ने मामले में केवल पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर ध्यान नहीं दिया। अदालत ने उन परिस्थितियों को भी महत्वपूर्ण माना जिनमें मृतक की मौत हुई।

रिकॉर्ड के मुताबिक, मृतक को आरोपी अपने साथ लेकर गया था और बाद में उसके डूबने की खबर सामने आई। इसके अलावा दो गवाहों ने आरोपी को घटनास्थल से भागते हुए देखने की बात कही थी।

सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, ऐसी परिस्थितियां मामले को संदेहास्पद बनाती हैं और इन्हें केवल पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

हालांकि, अदालत ने यह भी नहीं कहा कि आरोपी ने हत्या की है। उसका फैसला इस बात पर केंद्रित था कि इन परिस्थितियों की न्यायिक जांच ट्रायल में होनी चाहिए।

Trial बहाल करने का मतलब क्या है?

यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर समझना जरूरी है।

सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को दोषी घोषित नहीं किया है। अदालत ने केवल यह माना है कि उपलब्ध प्रारंभिक सामग्री इतनी महत्वपूर्ण है कि मामले को शुरुआत में ही खत्म नहीं किया जाना चाहिए।

अब ट्रायल कोर्ट में अभियोजन पक्ष को अपने आरोप साक्ष्यों के आधार पर साबित करने होंगे। आरोपी को अपना बचाव पेश करने का पूरा अधिकार रहेगा।

यानी इस आदेश का अर्थ यह नहीं है कि अदालत ने हत्या साबित मान ली है। इसका अर्थ है कि हत्या की संभावना को जांच और ट्रायल के स्तर पर परखा जाना चाहिए।

Closure Report पर भी सुप्रीम कोर्ट की अहम बात

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस की closure report और मजिस्ट्रेट की भूमिका से जुड़े कानूनी सिद्धांत पर भी जोर दिया।

अदालत ने कहा कि मजिस्ट्रेट पुलिस की इस राय से हमेशा बंधा नहीं होता कि कोई अपराध नहीं हुआ। उपलब्ध सामग्री को देखकर अदालत अलग निष्कर्ष पर पहुंच सकती है।

मजिस्ट्रेट के पास कई विकल्प होते हैं—वह closure report स्वीकार कर सकता है, उपलब्ध सामग्री के आधार पर cognisance ले सकता है या उचित परिस्थितियों में आगे की जांच का रास्ता भी खुला रख सकता है।

इस तरह सुप्रीम कोर्ट का आदेश केवल इस drowning case तक सीमित नहीं है, बल्कि पुलिस जांच और मजिस्ट्रेट की न्यायिक भूमिका के बीच संबंध को भी स्पष्ट करता है।

Drowning cases में जांच का दायरा क्यों महत्वपूर्ण?

किसी व्यक्ति की पानी में डूबने से मौत होने पर मेडिकल रिपोर्ट अक्सर मृत्यु का कारण बता सकती है, लेकिन यह हमेशा यह नहीं बता सकती कि व्यक्ति खुद पानी में गया, दुर्घटनावश गिरा, किसी परिस्थिति में डूबा या किसी दूसरे व्यक्ति ने उसे पानी में धकेला।

इसीलिए ऐसे मामलों में last-seen evidence, eyewitness accounts, घटनास्थल की परिस्थितियां, आरोपी का व्यवहार, डिजिटल/अन्य साक्ष्य और घटना से पहले की परिस्थितियां महत्वपूर्ण हो सकती हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने इसी व्यापक दृष्टिकोण को अपनाते हुए कहा कि इस मामले में उपलब्ध परिस्थितियों को ट्रायल के दौरान परखा जाना चाहिए।

अब आगे क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद आरोपी के खिलाफ मर्डर और evidence disappearance से जुड़ी कार्यवाही आगे बढ़ सकेगी।

अब निचली अदालत उपलब्ध दस्तावेजों, गवाहों और अन्य साक्ष्यों के आधार पर मामले की सुनवाई करेगी। अभियोजन पक्ष को यह साबित करना होगा कि मौत दुर्घटना नहीं बल्कि आपराधिक कृत्य का परिणाम थी।

दूसरी ओर, आरोपी को अपने बचाव में यह साबित करने का अवसर मिलेगा कि उपलब्ध परिस्थितियां हत्या के आरोप को स्थापित नहीं करतीं।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का सबसे अहम संदेश यही है कि “drowning” मौत का तरीका बता सकता है, लेकिन अपने आप यह साबित नहीं करता कि मौत accidental थी।

अंतिम फैसला ट्रायल में पेश होने वाले साक्ष्यों के आधार पर ही होगा।