गौहाटी हाईकोर्ट ने 6 अक्टूबर को 38 दिन की नवजात बच्ची की हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रही मां को बरी कर दिया। जस्टिस एम. जोथनखुमा और जस्टिस राजेश मजूमदार की खंडपीठ ने सितंबर 2023 की निचली अदालत की दोषसिद्धि को रद्द कर दिया।
अदालत ने पाया कि महिला के खिलाफ इस्तेमाल किया गया कथित कबूलनामा कानूनन मान्य नहीं था। महिला ने जो कबूलनामा दिया था, उस पर एक महिला हेड कांस्टेबल के हस्ताक्षर थे। पुलिस अधिकारी की प्रत्यक्ष मौजूदगी में दिया गया यह बयान आधिकारिक दबाव से मुक्त नहीं हो सकता था।
मानसिक स्थिति पर गंभीर टिप्पणी
अदालत ने प्रसवोत्तर मनोविकृति (पोस्टपार्टम साइकोसिस) जैसी गंभीर मानसिक स्थिति की संभावना पर विशेष ध्यान दिया। यह स्थिति प्रति 1,000 में से 1 या 2 महिलाओं में देखी जाती है। इस दौरान महिलाएं वास्तविकता से संपर्क खो सकती हैं, भ्रम और मतिभ्रम का शिकार हो सकती हैं।
अदालत ने कहा कि निचली अदालत को मामले की सुनवाई के दौरान इस पहलू पर गंभीरता से विचार करना चाहिए था। हालांकि हाईकोर्ट ने यह तय नहीं किया कि महिला वास्तव में इस मानसिक स्थिति से गुजर रही थी या नहीं।
बच्ची कैसे गायब हुई
2016 में महिला की नवजात बच्ची रातोंरात गायब हुई थी। महिला के पति ने लापता होने की रिपोर्ट दर्ज करवाई थी। महिला ने आरोप लगाया कि उसने 14 अक्टूबर 2016 को बच्ची को मार डाला और शव को दिखौ नदी में फेंक दिया।
निचली अदालत ने महिला को हत्या और साक्ष्य मिटाने का दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। हाईकोर्ट के फैसले के बाद वह रिहा हो गई है।