भारत में सैकड़ों जनजातीय भाषाओं और बोलियों को बचाने के लिए राष्ट्रीय संग्रह बनाने की योजना शुरू की गई है। जनजातीय मामलों के मंत्रालय ने 24 से 26 अगस्त 2026 को मैसूर, कर्नाटक में राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया।
इन भाषाओं में से बहुत सारी अभी लिखी नहीं गई हैं। स्कूलों में पढ़ाई नहीं होती और नई पीढ़ी को हस्तांतरित नहीं हो रहीं। सरकार ने दस्तावेज़ीकरण, संरक्षण और पुनर्जीवन के लिए एक राष्ट्रीय रणनीति बनाने का फैसला किया है।
नई तकनीकें लॉन्च
मंत्रालय ने आदि वाणी मंच को अपग्रेड किया, जो जनजातीय भाषाओं के संरक्षण के लिए तकनीकी पहल है। इसमें अब आईओएस एप्लिकेशन जोड़ी गई है और पाँच और भाषाएँ शामिल की गई हैं।
सरकार ने जागो नाम का कृत्रिम बुद्धिमत्ता सहायक भी बनाया है। यह जनजातीय कल्याण योजनाओं और कार्यक्रमों की जानकारी देता है।
भाषा संस्थान के साथ समझौता
जनजातीय मामलों के मंत्रालय और केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान ने एक समझौता पत्र पर हस्ताक्षर किए। इससे भाषा दस्तावेज़ीकरण और डेटा संग्रह में सहयोग बढ़ेगा।
सम्मेलन में सरकारी अधिकारी, भाषा विशेषज्ञ, शोधकर्ता, तकनीकी विशेषज्ञ और जनजातीय समुदाय के सदस्य शामिल हुए। स्वचालित भाषण पहचान, पाठ-से-भाषण, मशीन अनुवाद और डिजिटल कीबोर्ड जैसी तकनीकों पर विचार किया गया।
कर्नाटक में शुरुआत
कर्नाटक जनजातीय कल्याण विभाग और राज्य जनजातीय अनुसंधान संस्थान ने जनजातीय भाषाओं में पाठ्य सामग्री तैयार की है। जेनुकुरुबा भाषा में कक्षा 1 के लिए कन्नड़, गणित और पर्यावरण अध्ययन की किताबें लाई गई हैं।
जनजातीय भाषाओं में बहुभाषीय शिक्षा से कक्षा में सीखना बेहतर हो सकता है। साथ ही आदिवासी ज्ञान और संस्कृति भी सुरक्षित रहेगी।