कर्नाटक हाईकोर्ट ने सोमवार, 12 अक्टूबर को अनुसूचित जातियों और जनजातियों के आरक्षण बढ़ाने वाले कानून को रद्द कर दिया। मुख्य न्यायाधीश विभु बखरु और न्यायाधीश के.एस. हेमलेखा की खंडपीठ ने फैसला सुनाया।
2022 के कानून में SC आरक्षण 15 से 17 प्रतिशत बढ़ाया गया था और ST आरक्षण 3 से 7 प्रतिशत। OBC आरक्षण 32 प्रतिशत ही रहा। इससे कुल आरक्षण 50 से 56 प्रतिशत हो गया था।
अदालत ने कहा कि यह कुल आरक्षण 56 प्रतिशत संविधान की 50 प्रतिशत की सीमा का उल्लंघन करता है। कानून के तीसरे और चौथे खंड को असंवैधानिक घोषित किया गया। अदालत ने माना कि ये खंड संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 का उल्लंघन करते हैं।
परामर्श में देरी का सवाल
अदालत ने यह भी पाया कि राज्य सरकार ने अनुसूचित जातियों के लिए राष्ट्रीय आयोग और अनुसूचित जनजातियों के लिए राष्ट्रीय आयोग से परामर्श नहीं लिया। ये परामर्श संविधान के अनुच्छेद 338(9) और 338A(9) के तहत अनिवार्य था।
राज्य सरकार ने 10 दिसंबर 2025 और 20 जनवरी 2026 को भेजे गए पत्रों के आधार पर दावा किया कि परामर्श ले लिया गया था। लेकिन ये पत्र कानून के बनने के लगभग तीन साल बाद भेजे गए थे।
अदालत ने कहा कि परामर्श का मतलब तब होता है जब फैसले से पहले लिया जाए, बाद में नहीं। बिना सार्थक परामर्श के आरक्षण बढ़ाना गलत है।
जनसंख्या के अनुपात में कम प्रतिनिधित्व
न्यायालय के आँकड़ों के अनुसार, कर्नाटक में अनुसूचित जातियों और जनजातियों का प्रतिनिधित्व 18 प्रतिशत है, जबकि उनकी कुल जनसंख्या 24.10 प्रतिशत है। अदालत ने माना कि कम प्रतिनिधित्व दिख रहा है, लेकिन इसके लिए आरक्षण 50 प्रतिशत की सीमा से बाहर नहीं जा सकता।
राज्य सरकार की प्रतिक्रिया
उप मुख्यमंत्री जी. परमेश्वर ने इस फैसले को सामाजिक न्याय और सार्वजनिक रोजगार के लिए एक गंभीर विकास बताया। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में अपील करने पर विचार कर रही है।
राज्य सरकार ने भारत सरकार से 50 प्रतिशत की यह सीमा बदलने के लिए कहा है। वह चाहती है कि बढ़ा हुआ आरक्षण संविधान की नौवीं सूची में शामिल किया जाए।
याचिकाकर्ताओं में रायचूर के सामाजिक कार्यकर्ता महेंद्र कुमार मित्र और अन्य लोग थे। उन्होंने 1992 के इंद्र साहनी फैसले में दिए गए कानून का हवाला देते हुए 56 प्रतिशत आरक्षण को चुनौती दी थी।