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क्या रसूख के आगे कमजोर पड़ गया कानून? नाबालिग की मर्सिडीज से मौत के बाद जज पिता के घर पुलिस की तलाशी!

कोच्चि में 55 वर्षीय स्कूटर सवार की जान लेने वाले हादसे में 17 वर्षीय किशोर आरोपी; केरल हाईकोर्ट के निर्देश पर न्यायाधीश के आवास की तलाशी, CCTV फुटेज और अन्य सबूत जुटाए गए। शुरुआती पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठने के बाद जांच क्राइम ब्रांच के पास।

क्या रसूख के आगे कमजोर पड़ गया कानून? नाबालिग की मर्सिडीज से मौत के बाद जज पिता के घर पुलिस की तलाशी!
प्रतीकात्मक तस्वीर, AI से बनाई गई। यह वास्तविक घटना का चित्रण नहीं है।

कोच्चि में जानलेवा टक्कर के बाद जांच तेज

केरल के कोच्चि में एक सड़क हादसे ने कानून के समान अनुपालन और नाबालिगों की ड्राइविंग को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। चेरानेल्लूर इलाके में कथित तौर पर तेज रफ्तार मर्सिडीज-बेंज कार ने एक स्कूटर को टक्कर मार दी, जिससे 55 वर्षीय जयबालकृष्णन की मौत हो गई। पुलिस के अनुसार, हादसे के समय कार कथित तौर पर एक 17 वर्षीय किशोर चला रहा था, जिसके पिता अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश हैं।

मामले ने उस समय नया मोड़ लिया, जब पुलिस ने न्यायाधीश को भी वाहन के पंजीकृत मालिक के रूप में आरोपी बनाया। इसके बाद बुधवार, 28 अक्टूबर को केरल हाईकोर्ट के निर्देश पर न्यायाधीश के आवास की तलाशी ली गई। जांच अधिकारियों ने CCTV फुटेज और अन्य साक्ष्य जुटाए। अब जांच का केंद्र यह पता लगाना है कि हादसा किन परिस्थितियों में हुआ, नाबालिग को वाहन चलाने की अनुमति कैसे मिली और शुरुआती पुलिस कार्रवाई में कोई चूक हुई थी या नहीं।

आखिर कैसे हुआ हादसा?

पुलिस और मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, दुर्घटना रविवार, 25 अक्टूबर की तड़के करीब 2:20 बजे चेरानेल्लूर के मरापरम्बु के पास कंटेनर रोड पर हुई। जयबालकृष्णन अपनी दुकान बंद करने के बाद स्कूटर से घर लौट रहे थे। इसी दौरान पीछे से आ रही मर्सिडीज-बेंज ने उनके स्कूटर को टक्कर मार दी।

जयबालकृष्णन की मौके पर ही मौत हो गई। वह सड़क किनारे खाने-पीने की दुकान चलाते थे और अपने परिवार के लिए कमाई का प्रमुख सहारा थे। हादसे के बाद परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा।

पुलिस की शुरुआती जांच में कार की गति 100 किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक होने की आशंका जताई गई थी। हालांकि, वाहन की वास्तविक गति और टक्कर की परिस्थितियों की अंतिम पुष्टि जांच में जुटाए गए साक्ष्यों के विश्लेषण के बाद ही होगी।

न्यायाधीश के आवास पर तलाशी क्यों हुई?

मामले में सबसे महत्वपूर्ण घटनाक्रम बुधवार को सामने आया। केरल हाईकोर्ट के निर्देश पर पुलिस की क्राइम ब्रांच टीम न्यायाधीश के अलुवा स्थित आवास पर पहुंची। तलाशी के दौरान अपार्टमेंट परिसर के CCTV फुटेज और अन्य जरूरी साक्ष्य जुटाए गए।

जांच का उद्देश्य यह पता लगाना है कि दुर्घटना वाली रात कार किसने निकाली, वाहन के इस्तेमाल से जुड़ी परिस्थितियां क्या थीं और उपलब्ध डिजिटल साक्ष्य घटनाक्रम के बारे में क्या बताते हैं।

न्यायाधीश के खिलाफ कार्रवाई इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कार उनके नाम पर पंजीकृत बताई गई है। पुलिस ने मोटर वाहन कानून के उन प्रावधानों के तहत कार्रवाई की है, जो नाबालिग द्वारा वाहन से अपराध किए जाने की स्थिति में वाहन मालिक या अभिभावक की जिम्मेदारी से संबंधित हैं।

यह कार्रवाई अपने आप में न्यायाधीश को दोषी साबित नहीं करती। उनकी भूमिका और जिम्मेदारी का निर्धारण कानूनी प्रक्रिया तथा जांच के नतीजों के आधार पर होगा।

शुरुआती जमानत के बाद क्यों भड़का विवाद?

हादसे के बाद पुलिस ने शुरुआत में किशोर के खिलाफ लापरवाही से वाहन चलाने और मौत का कारण बनने से संबंधित प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया था। उसे पुलिस स्टेशन से जमानत पर छोड़ दिया गया। इस फैसले के बाद मृतक के परिवार ने पुलिस स्टेशन के बाहर विरोध प्रदर्शन किया और आरोप लगाया कि आरोपी को अनुचित राहत दी गई।

परिवार का सवाल था कि यदि किसी सामान्य परिवार का सदस्य ऐसे हादसे में शामिल होता, तो क्या उसके साथ भी यही प्रक्रिया अपनाई जाती? मृतक की बेटी ने पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए न्याय और जवाबदेही की मांग की।

परिवार के विरोध के बाद मामले में अधिक गंभीर आरोप से संबंधित भारतीय न्याय संहिता की धारा 105 भी जोड़ी गई। यह धारा हत्या की श्रेणी में न आने वाले आपराधिक मानव वध से संबंधित है। किशोर को दोबारा हिरासत में लिया गया और किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष पेश किया गया, जहां से उसे जमानत मिल गई।

अब पुलिस उसकी जमानत रद्द कराने के लिए कानूनी कदम उठाने की प्रक्रिया में है। जमानत रद्द होगी या नहीं, इसका निर्णय संबंधित अदालत करेगी।

न्यायाधीश पिता भी जांच के दायरे में

पुलिस ने कार के पंजीकृत मालिक होने के आधार पर किशोर के पिता को भी मामले में आरोपी बनाया है। रिपोर्टों के अनुसार, न्यायाधीश ने पुलिस को बताया कि उन्हें जानकारी नहीं थी कि उनका बेटा कार लेकर गया था। किशोर ने भी इसी तरह का दावा किया है। पुलिस इन दावों की जांच कर रही है और उपलब्ध साक्ष्यों से उनका मिलान किया जा रहा है।

न्यायाधीश के खिलाफ कार्रवाई संवेदनशील है, क्योंकि वह एक पदस्थ न्यायिक अधिकारी हैं। ऐसे मामलों में न्यायिक अधिकारियों से जुड़े कानूनी और प्रक्रियागत नियमों का पालन करना जरूरी होता है। हाईकोर्ट के निर्देश पर हुई तलाशी इसी प्रक्रिया का हिस्सा है।

इस बीच, मोटर वाहन विभाग ने भी वाहन के पंजीकरण को निलंबित करने की प्रक्रिया शुरू करने की सूचना दी है। संबंधित अधिकारी से स्पष्टीकरण मांगे जाने के बाद आगे की कार्रवाई तय होगी।

क्या पुलिस की शुरुआती जांच में चूक हुई थी?

इस मामले में पुलिस की शुरुआती कार्रवाई पर भी सवाल उठे हैं। किशोर को पहले पुलिस स्टेशन से जमानत दिए जाने और उसके बाद परिवार के विरोध के चलते धाराएं बढ़ाए जाने के घटनाक्रम ने जांच की निष्पक्षता पर बहस शुरू कर दी।

राज्य के गृह मंत्री ने भी मामले की शुरुआती जांच में कथित चूकों पर नाराजगी जताई और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की बात कही। इसके बाद जांच स्थानीय पुलिस से हटाकर जिला क्राइम ब्रांच को सौंप दी गई।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, मामले में कुछ पुलिसकर्मियों को निलंबित भी किया गया है। हालांकि, किसी अधिकारी की अंतिम जिम्मेदारी जांच और विभागीय प्रक्रिया के निष्कर्षों के आधार पर ही तय होगी।

मृतक का परिवार अब क्या चाहता है?

जयबालकृष्णन के परिवार ने न्यायिक प्रक्रिया जारी रखने का फैसला किया है। परिवार किशोर की जमानत रद्द कराने और न्यायाधीश पिता की भूमिका पर कार्रवाई की मांग को लेकर अदालत जाने की तैयारी में है। मृतक की बेटी ने न्यायाधीश को पद से हटाने की मांग भी उठाई है।

परिवार की मांग है कि हादसे की निष्पक्ष जांच हो, आरोपी के साथ कोई विशेष व्यवहार न किया जाए और यदि किसी स्तर पर लापरवाही या नियमों का उल्लंघन हुआ है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जाए।

यह मामला अब केवल सड़क दुर्घटना तक सीमित नहीं रहा। इसमें नाबालिगों की ड्राइविंग, अभिभावकों की जिम्मेदारी, पुलिस की जवाबदेही और न्यायिक अधिकारियों पर लागू प्रक्रियाओं जैसे कई मुद्दे जुड़ गए हैं।

अब आगे क्या होगा?

फिलहाल क्राइम ब्रांच CCTV फुटेज, वाहन से संबंधित दस्तावेजों और अन्य साक्ष्यों की जांच कर रही है। अदालत में जमानत रद्द कराने की मांग और न्यायाधीश के खिलाफ आगे की कार्रवाई से जुड़े कदम भी महत्वपूर्ण होंगे।

सबसे अहम सवाल यही है कि क्या जांच सभी संबंधित लोगों की भूमिका को निष्पक्ष रूप से सामने ला पाएगी? इसका जवाब जांच के निष्कर्षों और अदालत के फैसलों से ही मिलेगा। जब तक कानूनी प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तब तक आरोपों और दोष सिद्ध होने के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है।