नई दिल्ली में संसद के संभावित Special Session को लेकर चल रही राजनीतिक अटकलों के बीच लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने स्थिति स्पष्ट कर दी है। उन्होंने कहा कि संसद का विशेष सत्र बुलाने का फैसला सरकार के स्तर पर होता है, जबकि स्पीकर की भूमिका सदन की कार्यवाही संचालित करने तक सीमित है। बिरला ने यह भी स्पष्ट किया कि फिलहाल वह इस बात पर कोई टिप्पणी नहीं करेंगे कि सरकार विशेष सत्र बुलाने की योजना बना रही है या नहीं।
यह बयान ऐसे समय आया है जब परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े संवैधानिक संशोधन विधेयकों को लेकर एक बार फिर राजनीतिक गतिविधियां तेज हैं। विपक्ष और राजनीतिक गलियारों में लगातार यह चर्चा चल रही है कि सरकार इन मुद्दों पर आगे बढ़ने के लिए संसद की बैठक दोबारा बुला सकती है।
ओम बिरला ने क्या कहा?
विशेष सत्र को लेकर पूछे गए सवाल पर ओम बिरला ने मूल रूप से यही स्पष्ट किया कि संसद को बुलाने की पहल सरकार करती है। संविधान के अनुच्छेद 85 के तहत राष्ट्रपति संसद के किसी सदन को बुलाते और स्थगित करते हैं, लेकिन यह प्रक्रिया केंद्रीय मंत्रिपरिषद की सलाह पर होती है। इसलिए Special Session बुलाने का निर्णय स्पीकर के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता।
यानी फिलहाल ओम बिरला के बयान का अर्थ यह नहीं है कि Special Session तय हो गया है। इसका सीधा मतलब है कि अगर सरकार ऐसा निर्णय लेती है तो संवैधानिक प्रक्रिया के तहत संसद की बैठक बुलाई जा सकती है।
मानसून सत्र खत्म हुआ, लेकिन एक संवैधानिक पेच बाकी
संसद का मानसून सत्र 13 अगस्त 2026 को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित किया गया था। हालांकि, उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार दोनों सदनों का अभी तक औपचारिक prorogation यानी सत्रावसान नहीं हुआ है। इसी वजह से संसद की अगली बैठक को लेकर संवैधानिक और प्रक्रियात्मक चर्चाएं भी तेज हुई हैं।
यह स्थिति महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी सदन के स्थगित होने और उसके औपचारिक सत्रावसान के बीच अंतर होता है। सत्रावसान के बाद नया सत्र बुलाने की प्रक्रिया अलग होती है, जबकि सत्रावसान न होने की स्थिति में उसी सत्र की आगे बैठक बुलाए जाने की संभावना पर भी चर्चा हो सकती है।
हालांकि, Special Session की तारीख, एजेंडा या आयोजन की आधिकारिक घोषणा अभी नहीं हुई है।
क्यों हो रही है Special Session की चर्चा?
इस पूरी चर्चा के केंद्र में महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े प्रस्ताव हैं।
इससे पहले 2026 में सरकार की ओर से महिला आरक्षण को लागू करने और उससे जुड़े परिसीमन के लिए संवैधानिक बदलाव का प्रयास किया गया था। लोकसभा में संबंधित संविधान संशोधन विधेयक को आवश्यक दो-तिहाई बहुमत नहीं मिल सका था, जिसके बाद मामला आगे नहीं बढ़ पाया।
अब राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि सरकार इन मुद्दों पर आगे की रणनीति बना सकती है। हालांकि, यह कहना अभी जल्दबाजी होगा कि सरकार निश्चित रूप से इन्हीं विधेयकों को लेकर Special Session बुलाएगी।
सरकार के पास विकल्प खुला
संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू भी पहले संकेत दे चुके हैं कि चूंकि मानसून सत्र का औपचारिक सत्रावसान नहीं हुआ है, इसलिए संसद की बैठक दोबारा बुलाने की संवैधानिक संभावना मौजूद है। हालांकि उन्होंने भी यह पुष्टि नहीं की थी कि सरकार Special Session बुलाने जा रही है।
इससे राजनीतिक अटकलों को और हवा मिली है। लेकिन सरकार की ओर से अभी तक कोई औपचारिक तारीख या एजेंडा घोषित नहीं किया गया है।
विपक्ष की नजर चुनाव और मतदाता सूची के मुद्दे पर भी
Special Session की चर्चा ऐसे समय हो रही है जब विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग और मतदाता सूची के Special Intensive Revision (SIR) को लेकर सरकार पर लगातार दबाव बना रहा है।
ओम बिरला ने CEC को हटाने से जुड़े किसी नए प्रस्ताव पर भी कहा है कि अगर ऐसा प्रस्ताव उनके पास आता है तो निर्धारित संवैधानिक और संसदीय प्रक्रिया का पालन किया जाएगा। इससे साफ है कि चुनावी प्रक्रिया से जुड़े मुद्दे भी आने वाले दिनों में संसद की राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकते हैं।
26-27 अक्टूबर को दिल्ली में BRICS Parliamentary Forum
इसी बीच संसद परिसर में 12वां BRICS Parliamentary Forum 26 और 27 अक्टूबर को आयोजित होने वाला है। लोकसभा अध्यक्ष ने बताया है कि इस कार्यक्रम में BRICS और साझेदार देशों के संसदीय नेता हिस्सा लेंगे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी मौजूद रहेंगे।
इस कार्यक्रम के कारण भी संसद परिसर में अगले कुछ दिन राजनीतिक और संसदीय गतिविधियों से भरे रहने वाले हैं। हालांकि, BRICS Parliamentary Forum अपने आप में संसद का Special Session नहीं है और दोनों को एक-दूसरे से जोड़कर देखना सही नहीं होगा।
क्या अब Special Session तय मानें?
नहीं।
फिलहाल उपलब्ध आधिकारिक और विश्वसनीय जानकारी के आधार पर Special Session को लेकर केवल अटकल और राजनीतिक चर्चा है। ओम बिरला ने इसकी पुष्टि नहीं की है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि स्पीकर ने अधिकार-क्षेत्र स्पष्ट करते हुए कहा है कि सत्र बुलाने का फैसला सरकार करती है। इसलिए अगला बड़ा संकेत केंद्र सरकार या संसदीय कार्य मंत्रालय की ओर से किसी औपचारिक घोषणा के रूप में आएगा।
अगर सरकार Special Session बुलाने का फैसला करती है, तो उसके एजेंडे, तारीख और विधेयकों की जानकारी आधिकारिक रूप से सामने आएगी। तब यह भी स्पष्ट होगा कि सरकार महिला आरक्षण, परिसीमन या किसी अन्य महत्वपूर्ण मुद्दे को सदन में लाने की तैयारी कर रही है।
फिलहाल इतना जरूर है कि Special Session की संभावना को सरकार ने बंद नहीं किया है, लेकिन इसे तय भी नहीं किया गया है। ओम बिरला का बयान इसी अंतर को स्पष्ट करता है।