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महाराष्ट्र में किसानों का ‘लाल मार्च’ मुंबई रवाना, 12 हजार से ज्यादा किसान सड़कों पर; कर्जमाफी और सूखा राहत की मांग

अखिल भारतीय किसान सभा के नेतृत्व में अकोले से शुरू हुआ वाहन लॉन्ग मार्च; 20 से अधिक जिलों के किसान 1,000 से ज्यादा वाहनों के साथ मुंबई की ओर बढ़े, ‘वर्षा’ पहुंचकर सरकार के सामने रखेंगे मांगें

महाराष्ट्र में किसानों का ‘लाल मार्च’ मुंबई रवाना, 12 हजार से ज्यादा किसान सड़कों पर; कर्जमाफी और सूखा राहत की मांग
प्रतीकात्मक तस्वीर, AI से बनाई गई। यह वास्तविक घटना का चित्रण नहीं है।

महाराष्ट्र में किसानों के मुद्दों को लेकर एक बार फिर बड़ा आंदोलन शुरू हो गया है। अहिल्यानगर जिले के अकोले से अखिल भारतीय किसान सभा के नेतृत्व में किसानों का वाहन लॉन्ग मार्च सोमवार, 26 अक्टूबर को मुंबई के लिए रवाना हुआ। किसान सभा के अनुसार इस मार्च में राज्य के 20 से अधिक जिलों के 12,000 से ज्यादा किसान और 1,000 से अधिक वाहन शामिल हैं। आंदोलनकारी मुंबई पहुंचकर मुख्यमंत्री के सरकारी आवास ‘वर्षा’ के सामने अपनी मांगें रखने की तैयारी में हैं।

मार्च से पहले अकोले में किसानों ने लाल झंडों के साथ पैदल मार्च भी निकाला। किसान सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अशोक धवले, राष्ट्रीय महासचिव डॉ. विजू कृष्णन, राष्ट्रीय संयुक्त सचिव डॉ. अजित नवले और CPI(M) विधायक विनोद निकोले समेत संगठन के नेताओं ने इसमें हिस्सा लिया। नासिक जिले से आया वाहनों का काफिला भी घोटी के पास मुख्य मार्च में शामिल हुआ।

पांच दिन के आंदोलन के बाद मुंबई कूच

किसान सभा ने अकोले में 21 से 26 अक्टूबर तक महामुक्काम सत्याग्रह किया था। संगठन का कहना है कि लगातार आंदोलन के बावजूद सरकार की ओर से उनकी प्रमुख मांगों पर ठोस निर्णय नहीं लिया गया, जिसके बाद मुंबई तक वाहन मार्च निकालने का फैसला किया गया।

मार्च शुरू होने से पहले पुलिस की ओर से प्रदर्शनकारियों को नोटिस दिए जाने की भी रिपोर्ट सामने आई है। इसके बावजूद किसान संगठनों ने मुंबई जाने का फैसला वापस नहीं लिया। किसान सभा का कहना है कि जब तक मांगों पर लिखित और ठोस आश्वासन नहीं मिलता, आंदोलन जारी रहेगा।

किसानों की सबसे बड़ी मांग—दो लाख रुपये तक कर्जमाफी

आंदोलन की प्रमुख मांगों में दो लाख रुपये तक की कर्जमाफी शामिल है। किसान सभा विशेष रूप से ऐसे किसानों को भी कर्जमाफी या प्रोत्साहन लाभ देने की मांग कर रही है, जिन्होंने अपने कृषि ऋण की नियमित अदायगी की है।

किसान संगठन का तर्क है कि नियमित रूप से कर्ज चुकाने वाले किसानों को भी राहत मिलनी चाहिए, क्योंकि कृषि संकट का असर केवल डिफॉल्टर किसानों तक सीमित नहीं है।

इसके साथ ही आंदोलनकारी फसल बीमा भुगतान में देरी और बाधाओं को दूर करने तथा फसल नुकसान के वास्तविक पंचनामों के आधार पर पर्याप्त मुआवजा देने की मांग उठा रहे हैं।

सूखे को लेकर बड़ा दावा

किसान सभा ने महाराष्ट्र में सूखे की स्थिति को लेकर गंभीर चिंता जताई है। संगठन के मुताबिक राज्य के 358 में से 305 तालुके सूखा प्रभावित घोषित किए गए हैं। इसी आधार पर किसान सभा का कहना है कि सरकार की ओर से घोषित ₹5,000 प्रति किसान परिवार की सहायता पर्याप्त नहीं है।

किसान संगठन की मांग है कि केवल एक समान सहायता देने के बजाय वास्तविक फसल नुकसान के आधार पर मुआवजा दिया जाए। संगठन ने सूखा राहत और फसल बीमा की रकम जल्द जारी करने की भी मांग की है।

यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि 305 तालुकों वाला आंकड़ा किसान सभा द्वारा प्रस्तुत दावा है; इसे सरकारी अंतिम आंकड़े के रूप में नहीं लिखा जाना चाहिए।

जमीन के अधिकार भी आंदोलन का बड़ा मुद्दा

कर्ज और फसल नुकसान के अलावा किसानों और आदिवासी समुदायों की जमीन के अधिकार से जुड़े मुद्दे भी मार्च के केंद्र में हैं।

किसान सभा वन भूमि, देवस्थान ट्रस्ट की जमीन, इनाम और गायरान जमीन पर खेती करने वाले पात्र लोगों के भूमि अधिकार दर्ज करने की मांग कर रही है। आदिवासी किसानों के लिए खेती की जा रही जमीन पर अधिकार का सवाल आंदोलन का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

संगठन की अन्य मांगों में नमो शेतकरी योजना की लंबित किस्तें, फसल बीमा, आदिवासी क्षेत्रों से जुड़े भूमि और पानी के सवाल तथा ग्रामीण कामगारों और महिलाओं से जुड़े कुछ मुद्दे भी शामिल हैं।

‘वर्षा’ तक पहुंचने की तैयारी

वाहन लॉन्ग मार्च का लक्ष्य मुंबई में मुख्यमंत्री के सरकारी आवास ‘वर्षा’ तक पहुंचकर सरकार के सामने अपनी मांगें रखना है। कुछ रिपोर्टों के अनुसार मार्च 27 अक्टूबर को मुंबई पहुंचने की योजना के साथ आगे बढ़ रहा है और इसके बाद आंदोलनकारी अनिश्चितकालीन धरने की तैयारी कर रहे हैं।

इतने बड़े वाहन काफिले के मुंबई पहुंचने से शहर के प्रवेश मार्गों और प्रमुख सड़कों पर ट्रैफिक व्यवस्था भी प्रशासन के लिए चुनौती बन सकती है। पुलिस और प्रशासन की ओर से आंदोलन के मार्ग और अंतिम प्रदर्शन स्थल को लेकर निगरानी बढ़ाई जा सकती है।

सरकार के सामने बढ़ी चुनौती

महाराष्ट्र सरकार के सामने अब दोहरी चुनौती है—एक तरफ सूखा, फसल नुकसान और कर्ज से परेशान किसानों की मांगों पर बातचीत करना और दूसरी तरफ बड़े पैमाने पर मुंबई की ओर बढ़ रहे आंदोलन को कानून-व्यवस्था और यातायात के लिहाज से संभालना।

किसान सभा पहले ही संकेत दे चुकी है कि केवल आश्वासन से आंदोलन खत्म नहीं होगा। संगठन लिखित निर्णय और मांगों पर कार्रवाई चाहता है। ऐसे में अब सबकी नजर इस बात पर है कि मुंबई पहुंचने के बाद सरकार और किसान नेताओं के बीच सीधी बातचीत होती है या आंदोलन और आगे बढ़ता है।

आगे क्या होगा?

फिलहाल किसान वाहनों का काफिला अकोले से मुंबई की ओर बढ़ रहा है। 27 अक्टूबर को मुंबई पहुंचने और ‘वर्षा’ के सामने अपनी मांगें रखने की योजना बताई गई है।

आने वाले घंटों में सरकार की ओर से बातचीत या प्रतिनिधिमंडल से चर्चा की पहल होती है तो आंदोलन का रुख बदल सकता है। अगर ठोस फैसला नहीं होता, तो किसान सभा ने आंदोलन को आगे जारी रखने का संकेत दिया है।