राजस्थान में पंचायती राज चुनाव के पहले चरण में ग्रामीण मतदाताओं ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया में जोरदार भागीदारी दिखाई। गुरुवार को 16 जिलों में जिला परिषद और पंचायत समिति सदस्यों के लिए मतदान हुआ। चुनाव अधिकारियों के अनुसार, शाम 6 बजे तक करीब 63 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया। हालांकि यह आंकड़ा अंतिम नहीं है और अंतिम मतदान प्रतिशत में कुछ बदलाव संभव है।
मतदान के दौरान कई इलाकों में पोलिंग बूथों पर लंबी कतारें दिखाई दीं। दूसरी ओर, कुछ गांवों में स्थानीय प्रशासनिक फैसलों, परिसीमन और आरक्षण व्यवस्था को लेकर नाराजगी इतनी बढ़ी कि ग्रामीणों ने मतदान का बहिष्कार करने का फैसला किया।
यानी पहले चरण की तस्वीर में एक तरफ मतदाताओं का उत्साह, तो दूसरी तरफ स्थानीय मुद्दों को लेकर विरोध—दोनों साथ दिखाई दिए।
16 जिलों में हुआ पहले चरण का मतदान
पहले चरण में अजमेर, अलवर, बाड़मेर, भीलवाड़ा, बीकानेर, डूंगरपुर, जयपुर, झालावाड़, जोधपुर, कोटा, नागौर, पाली, फलोदी, राजसमंद, सिरोही और उदयपुर जिलों में मतदान कराया गया।
इस चरण में 16 जिला परिषदों और 104 पंचायत समितियों के सदस्यों के चुनाव के लिए वोट डाले गए। अधिकारियों के अनुसार, 85 लाख से अधिक मतदाता इस चरण में मतदान के लिए पात्र थे।
कुल 2,081 सीटों के लिए 6,976 उम्मीदवार मैदान में थे। इनमें जिला परिषद की 293 सीटें और पंचायत समिति की 1,788 सीटें शामिल थीं।
कहां सबसे ज्यादा और कहां सबसे कम वोटिंग?
राजस्थान के अलग-अलग हिस्सों में मतदान प्रतिशत में काफी अंतर दिखाई दिया।
रिपोर्टों के अनुसार, बाड़मेर की मांगता पंचायत समिति में करीब 79.55 प्रतिशत मतदान दर्ज हुआ, जबकि उदयपुर की नाई पंचायत समिति में करीब 79 प्रतिशत वोट पड़े। दूसरी ओर, पाली की रानी स्टेशन पंचायत समिति में मतदान करीब 40 प्रतिशत के आसपास रहा।
इससे साफ है कि ग्रामीण राजस्थान में मतदान को लेकर मतदाताओं की प्रतिक्रिया एक जैसी नहीं रही। कुछ इलाकों में लोगों ने बड़ी संख्या में घरों से निकलकर वोट डाला, जबकि कुछ स्थानों पर स्थानीय मुद्दों ने मतदान की गति को प्रभावित किया।
जोधपुर में OBC आरक्षण को लेकर बहिष्कार
पहले चरण के दौरान जोधपुर के खिरजा मंगल सिंह नगर में ग्रामीणों ने मतदान का बहिष्कार किया। यहां विवाद पंचायत के सरपंच पद को OBC वर्ग के लिए आरक्षित किए जाने को लेकर था।
ग्रामीणों का दावा था कि ग्राम पंचायत में OBC मतदाता नहीं हैं, इसलिए वे आरक्षण व्यवस्था से असहमत हैं। प्रशासनिक अधिकारियों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने ग्रामीणों से बातचीत कर उन्हें मतदान के लिए मनाने का प्रयास किया।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पंचायत चुनाव में आरक्षण का निर्धारण सीधे स्थानीय राजनीतिक समीकरण और ग्रामीण प्रतिनिधित्व को प्रभावित करता है।
पाली में परिसीमन को लेकर नाराजगी
पाली जिले में भी कुछ गांवों में मतदान से दूरी बनाने की स्थिति सामने आई।
डूठारिया गांव के ग्रामीणों ने गांव के परिसीमन और पंचायत में शामिल किए जाने को लेकर विरोध किया। ग्रामीणों की शिकायत थी कि नई व्यवस्था के बाद उन्हें प्रशासनिक कामकाज के लिए दूसरे क्षेत्र तक पहुंचने में परेशानी होती है।
इसी तरह नेपावास गांव में भी वार्ड बदलने के विरोध में ग्रामीणों ने मतदान का बहिष्कार किया। ग्रामीणों का कहना था कि पहले उनका क्षेत्र एक वार्ड में था, लेकिन परिसीमन के बाद उसे दूसरे वार्ड में शामिल कर दिया गया।
यहां प्रशासन और ग्रामीणों के बीच बातचीत के जरिए स्थिति संभालने की कोशिश की गई।
कोटा में पंचायत बदलने से नाराज ग्रामीण
कोटा जिले के चकटोडी-टोडीखेड़ली गांव में भी मतदान का बहिष्कार किया गया। ग्रामीणों का विरोध गांव को एक दूसरी ग्राम पंचायत में शामिल किए जाने को लेकर था।
ग्रामीणों के अनुसार, उनका गांव पहले ढिपरी चंबल ग्राम पंचायत का हिस्सा था, लेकिन बाद में इसे सिनोता ग्राम पंचायत में शामिल कर दिया गया। दोनों के बीच करीब 11 किलोमीटर की दूरी होने की बात सामने आई है।
ग्रामीणों का कहना था कि इससे विशेष रूप से बुजुर्ग लोगों को प्रशासनिक काम के लिए आने-जाने में परेशानी होती है। वे पुराने पंचायत क्षेत्र में वापस शामिल करने की मांग कर रहे हैं।
सिर्फ बहिष्कार ही नहीं, EVM की तकनीकी दिक्कत भी
मतदान के दौरान कुछ स्थानों पर EVM में तकनीकी खराबी की शिकायतें भी सामने आईं।
कोटा के सांगोद क्षेत्र के एक मतदान केंद्र पर मशीन में खराबी आने के कारण कुछ समय के लिए मतदान प्रभावित हुआ। मशीन बदलने के बाद वोटिंग दोबारा शुरू कराई गई। पाली के एक मतदान केंद्र पर भी EVM में समस्या के कारण मतदान करीब एक घंटे तक प्रभावित रहने की रिपोर्ट है।
हालांकि ये घटनाएं स्थानीय स्तर की तकनीकी समस्याएं थीं और संबंधित अधिकारियों ने वैकल्पिक मशीन उपलब्ध कराकर मतदान प्रक्रिया आगे बढ़ाई।
85 लाख से ज्यादा मतदाताओं के सामने 6,976 उम्मीदवार
पहले चरण में चुनावी मुकाबला काफी बड़ा रहा। 85,07,306 मतदाता जिला परिषद और पंचायत समिति के प्रतिनिधियों का चुनाव करने के लिए पात्र थे।
इनके सामने कुल 6,926 उम्मीदवार मैदान में थे। भाजपा और कांग्रेस मुख्य राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी हैं, जबकि कई क्षेत्रों में RLP, BAP और निर्दलीय उम्मीदवार भी प्रभावी भूमिका में हैं।
पंचायत चुनावों को केवल स्थानीय प्रतिनिधियों के चुनाव के तौर पर नहीं देखा जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में राजनीतिक दलों के संगठन और जमीनी पकड़ को परखने के लिहाज से भी इन चुनावों की अहमियत है।
2028 विधानसभा चुनाव से पहले अहम राजनीतिक परीक्षा
राजस्थान में हाल ही में नगर निकाय चुनावों के बाद पंचायत चुनाव हो रहे हैं। ऐसे में ग्रामीण निकाय चुनावों को भाजपा और कांग्रेस के लिए जमीनी ताकत परखने का महत्वपूर्ण अवसर माना जा रहा है।
राज्य में अगला विधानसभा चुनाव 2028 के अंत में होना प्रस्तावित है। उससे पहले पंचायत स्तर पर मिलने वाला जनसमर्थन राजनीतिक दलों को ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी रणनीति और संगठनात्मक स्थिति का आकलन करने में मदद करेगा।
हालांकि पंचायत चुनाव के स्थानीय मुद्दे विधानसभा चुनाव के मुद्दों से अलग हो सकते हैं। इसलिए इनके नतीजों को सीधे विधानसभा चुनाव का संकेत मानना जल्दबाजी होगी।
अभी चुनाव का एक चरण बाकी नहीं, आगे भी जारी रहेगी प्रक्रिया
राजस्थान में पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव कई चरणों में कराए जा रहे हैं। पहले चरण के बाद जिला परिषद और पंचायत समिति सदस्यों के लिए अगला मतदान 28 अक्टूबर को और तीसरा चरण 3 नवंबर को होना है।
इसके बाद पंच और सरपंच पदों के लिए 5 नवंबर को मतदान और उपसरपंचों के अप्रत्यक्ष चुनाव की प्रक्रिया 6 नवंबर को होगी।
इसका मतलब है कि आने वाले दिनों में भी ग्रामीण राजस्थान में चुनावी गतिविधियां तेज रहने वाली हैं।
बहिष्कार से क्या संकेत मिलता है?
पहले चरण में हुए बहिष्कार की घटनाएं यह दिखाती हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय प्रशासनिक फैसले सीधे राजनीतिक भागीदारी को प्रभावित कर सकते हैं।
पंचायत की सीमा, वार्ड का परिसीमन, आरक्षण और गांव को किस पंचायत में शामिल किया जाए—ये ऐसे मुद्दे हैं जिनका असर ग्रामीणों की रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ता है। इसलिए इन फैसलों को लेकर असहमति होने पर लोगों ने मतदान जैसे लोकतांत्रिक माध्यम का इस्तेमाल विरोध दर्ज कराने के लिए किया।
हालांकि कुल मिलाकर 63 प्रतिशत मतदान यह भी बताता है कि बहिष्कार कुछ इलाकों तक सीमित रहा और राज्य के बड़े हिस्से में मतदाता मतदान केंद्रों तक पहुंचे।
अब नजर अगले चरण पर
पहले चरण की वोटिंग पूरी होने के बाद अब प्रशासन के सामने अगले चरणों को शांतिपूर्ण तरीके से कराने की चुनौती है। खासतौर पर उन क्षेत्रों में जहां आरक्षण, परिसीमन या स्थानीय प्रशासनिक फैसलों को लेकर नाराजगी सामने आई है, वहां प्रशासन को लोगों से संवाद बनाए रखना होगा।
दूसरी ओर, राजनीतिक दल भी पहले चरण की वोटिंग के आधार पर ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी रणनीति को मजबूत करने की कोशिश करेंगे।
फिलहाल पहले चरण का सबसे बड़ा संदेश यही है कि राजस्थान के ग्रामीण मतदाता चुनाव में सक्रिय हैं, लेकिन स्थानीय मुद्दों को नजरअंदाज करने पर कुछ क्षेत्रों में मतदान का बहिष्कार भी राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था के लिए संकेत बन सकता है।