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कौन हैं IAS अभय सिंह? 2019 के खनन केस से फिर चर्चा में आए अधिकारी, MLC चुनाव से मतगणना से ठीक पहले हटाए गए

गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक MLC सीट के पर्यवेक्षक पद से हटाए गए 2007 बैच के IAS अभय सिंह; BJP MLC देवेंद्र प्रताप सिंह ने 2019 के CBI मामले का हवाला देकर शिकायत की थी, उनकी जगह IAS प्रकाश बिंदु को जिम्मेदारी

कौन हैं IAS अभय सिंह? 2019 के खनन केस से फिर चर्चा में आए अधिकारी, MLC चुनाव से मतगणना से ठीक पहले हटाए गए
प्रतीकात्मक तस्वीर, AI से बनाई गई। यह वास्तविक घटना का चित्रण नहीं है।

उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक और चुनावी गलियारों में IAS अभय सिंह एक बार फिर चर्चा में हैं। वजह है गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के चुनाव पर्यवेक्षक पद से उनका हटाया जाना। मतगणना से ठीक एक दिन पहले 26 अक्टूबर 2026 को निर्वाचन आयोग ने अभय सिंह की जगह 2009 बैच के IAS अधिकारी प्रकाश बिंदु को नया चुनाव पर्यवेक्षक नियुक्त किया।

इस फैसले के पीछे BJP MLC देवेंद्र प्रताप सिंह की शिकायत को प्रमुख घटनाक्रम के तौर पर बताया जा रहा है। देवेंद्र प्रताप सिंह ने 23 अक्टूबर को चुनाव आयोग को पत्र/ईमेल भेजकर अभय सिंह की नियुक्ति पर सवाल उठाए थे और उनके खिलाफ 2019 के कथित अवैध खनन मामले का हवाला दिया था।

हालांकि, यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि चुनाव पर्यवेक्षक पद से हटाया जाना अपने आप में अभय सिंह के खिलाफ लगे पुराने आरोपों को साबित नहीं करता। उपलब्ध रिपोर्टों में आयोग की ओर से इस फैसले की विस्तृत वजह सार्वजनिक नहीं की गई है।

कौन हैं IAS अभय सिंह?

अभय सिंह 2007 बैच के IAS अधिकारी हैं और उत्तर प्रदेश कैडर से संबंधित हैं। अपने लंबे प्रशासनिक करियर में वह कई महत्वपूर्ण जिलों में जिलाधिकारी की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं।

रिपोर्टों के मुताबिक वह फतेहपुर, बुलंदशहर, रायबरेली और बहराइच जैसे जिलों में DM रह चुके हैं। वर्तमान में वह राजस्व परिषद के सदस्य के रूप में कार्यरत बताए गए हैं।

उनका प्रशासनिक करियर उस समय खास तौर पर चर्चा में आया जब 2019 में CBI की अवैध खनन जांच के दौरान उनके खिलाफ मामला दर्ज होने और उनके बुलंदशहर स्थित सरकारी आवास पर CBI की छापेमारी की खबर सामने आई थी।

2019 में क्यों आए थे सुर्खियों में?

मामला उत्तर प्रदेश में 2012 से 2016 के बीच कथित अवैध खनन और खनन पट्टों के नवीनीकरण से जुड़ा था।

CBI ने 2019 में इस मामले की जांच के दौरान तत्कालीन बुलंदशहर DM अभय सिंह समेत कुछ अधिकारियों के परिसरों पर छापेमारी की थी। CBI के मुताबिक, अभय सिंह पर फतेहपुर के जिलाधिकारी रहते हुए खनन लाइसेंस/पट्टों के आवंटन या नवीनीकरण में कथित अनियमितताओं से जुड़ी भूमिका का आरोप था।

CBI की कार्रवाई के दौरान उनके परिसर से करीब ₹47 लाख नकद बरामद होने की रिपोर्ट भी सामने आई थी। हालांकि उस समय अभय सिंह ने कहा था कि CBI की कार्रवाई का संबंध उनके बुलंदशहर कार्यकाल से नहीं, बल्कि फतेहपुर में दिए गए खनन पट्टों की जांच से था। उन्होंने नकदी को लेकर भी अपना पक्ष रखा था।

यानी 2019 की घटना में CBI का केस और छापेमारी तथ्यात्मक रूप से दर्ज घटनाएं हैं, लेकिन इससे यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि अभय सिंह को अदालत ने उस मामले में दोषी ठहरा दिया था।

फतेहपुर की पोस्टिंग भी जांच के केंद्र में रही

अभय सिंह सितंबर 2013 से जून 2014 तक फतेहपुर के जिलाधिकारी रहे थे। इसी अवधि से जुड़े कुछ खनन पट्टों को लेकर बाद में CBI जांच हुई।

CBI ने आरोप लगाया था कि कुछ खनन पट्टों के नवीनीकरण में उस समय लागू ई-टेंडरिंग प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया और तत्कालीन DM के स्तर पर संबंधित दस्तावेजों को मंजूरी दी गई।

2019 में CBI ने इस मामले में अभय सिंह के खिलाफ FIR दर्ज किए जाने की जानकारी दी थी। इसी पुराने मामले को अब BJP MLC देवेंद्र प्रताप सिंह ने चुनाव आयोग के सामने अपनी शिकायत का आधार बनाया।

देवेंद्र प्रताप सिंह ने क्या शिकायत की?

गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक MLC चुनाव में अभय सिंह को पर्यवेक्षक नियुक्त किए जाने के बाद देवेंद्र प्रताप सिंह ने चुनाव आयोग से सवाल किया कि ऐसे अधिकारी, जिनके खिलाफ पुराने CBI मामले का उल्लेख है, उन्हें संवेदनशील चुनावी जिम्मेदारी क्यों दी गई।

उन्होंने आयोग से अभय सिंह को पर्यवेक्षक पद से हटाने और उनकी नियुक्ति की परिस्थितियों की समीक्षा करने की मांग की। उनका तर्क था कि चुनाव की निष्पक्षता और पारदर्शिता को लेकर किसी तरह का संदेह नहीं रहना चाहिए।

कुछ रिपोर्टों में देवेंद्र प्रताप सिंह को BJP का बागी MLC बताया गया है, जबकि अन्य रिपोर्टें उन्हें BJP के मौजूदा MLC के रूप में संदर्भित करती हैं। इसलिए यहां उन्हें BJP MLC देवेंद्र प्रताप सिंह कहना अधिक सुरक्षित है।

मतगणना से ठीक पहले बदला पर्यवेक्षक

शिकायत के कुछ ही दिनों बाद निर्वाचन आयोग ने अभय सिंह को चुनाव पर्यवेक्षक की जिम्मेदारी से हटा दिया।

उनकी जगह IAS प्रकाश बिंदु, जो 2009 बैच के अधिकारी हैं, को नियुक्त किया गया। उन्हें तत्काल निर्वाचन क्षेत्र में पहुंचकर जिम्मेदारी संभालने के निर्देश दिए गए।

यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र की मतगणना 27 अक्टूबर को होनी है। यानी पर्यवेक्षक बदलने का फैसला चुनावी प्रक्रिया के बेहद संवेदनशील चरण में हुआ।

क्या आयोग ने अभय सिंह को किसी अपराध में दोषी माना है?

नहीं। उपलब्ध जानकारी से ऐसा निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा।

चुनाव आयोग ने अभय सिंह को पर्यवेक्षक पद से हटाया है, लेकिन उपलब्ध रिपोर्टों में आयोग की ओर से यह नहीं कहा गया है कि 2019 के खनन मामले में लगाए गए आरोप साबित हो चुके हैं।

2019 में CBI ने मामला दर्ज किया, जांच और छापेमारी की तथा आरोप लगाए गए थे। दूसरी ओर, अभय सिंह ने उस समय अपना पक्ष रखते हुए आरोपों और नकदी से संबंधित रिपोर्टों पर स्पष्टीकरण दिया था।

इसलिए “CBI केस में आरोपी” और “अदालत से दोषी साबित”—इन दोनों बातों को अलग-अलग रखना जरूरी है।

सवाल सिर्फ अभय सिंह का नहीं, चुनावी भरोसे का भी

मतगणना से ठीक पहले पर्यवेक्षक बदलने के फैसले ने चुनावी माहौल में चर्चा जरूर तेज कर दी है। खासकर तब, जब उत्तर प्रदेश में इस समय 11 विधान परिषद सीटों के चुनाव की मतगणना हो रही है।

चुनाव पर्यवेक्षक की भूमिका चुनाव प्रक्रिया की निगरानी और निष्पक्षता सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण होती है। इसलिए किसी भी अधिकारी की नियुक्ति पर राजनीतिक या उम्मीदवार स्तर से आपत्ति आने के बाद आयोग के सामने सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा चुनावी प्रक्रिया पर भरोसा बनाए रखना होता है।

इस मामले में आयोग ने नया पर्यवेक्षक नियुक्त कर दिया है। अब सभी की नजर IAS प्रकाश बिंदु की निगरानी में होने वाली मतगणना और आयोग की आगे की कार्रवाई पर है।

आगे क्या होगा?

अब तीन चीजें महत्वपूर्ण होंगी—पहली, 27 अक्टूबर की मतगणना किस तरह संपन्न होती है; दूसरी, क्या आयोग अभय सिंह को हटाने के फैसले के पीछे कोई विस्तृत कारण या रिपोर्ट सार्वजनिक करता है; और तीसरी, 2019 के पुराने CBI मामले की वर्तमान कानूनी स्थिति क्या है।

फिलहाल उपलब्ध तथ्यों के आधार पर इतना स्पष्ट है कि अभय सिंह को चुनाव पर्यवेक्षक पद से हटा दिया गया है और उनकी जगह प्रकाश बिंदु को जिम्मेदारी दी गई है।

लेकिन इस कार्रवाई को सीधे तौर पर 2019 के खनन मामले में दोष सिद्ध होने से जोड़ना सही नहीं होगा। पुराने मामले की कानूनी स्थिति और चुनाव आयोग की कार्रवाई—दोनों को अलग-अलग संदर्भ में देखना जरूरी है।