केरल के कोच्चि में एक सड़क हादसे ने नाबालिगों के वाहन चलाने, सड़क सुरक्षा और कानून के समान इस्तेमाल को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। 25 अक्टूबर 2026 की सुबह चेरानल्लूर इलाके में एक मर्सिडीज-बेंज कार की टक्कर से 55 वर्षीय जयबालकृष्णन की मौत हो गई। आरोप है कि कार एक 17 वर्षीय किशोर चला रहा था, जिसके पिता अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश हैं।
हादसे के बाद किशोर को शुरुआती तौर पर पुलिस स्टेशन से जमानत मिल गई थी। इसके बाद मृतक के परिवार और स्थानीय लोगों ने पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाए। मामला आगे बढ़ा तो जांच क्राइम ब्रांच को सौंप दी गई। पुलिस ने न्यायिक अधिकारी के अलुवा स्थित आवास की तलाशी ली, डिजिटल साक्ष्य जुटाए और कार के पंजीकृत मालिक के रूप में उनके खिलाफ भी मामला दर्ज किया।
आधी रात के बाद हुआ हादसा, घर लौट रहे थे जयबालकृष्णन
पुलिस और मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, दुर्घटना रविवार, 25 अक्टूबर को रात करीब 2:20 बजे चेरानल्लूर के मरापरम्बु इलाके में कंटेनर रोड पर हुई। जयबालकृष्णन अपना छोटा भोजनालय बंद करने के बाद स्कूटर से घर लौट रहे थे।
इसी दौरान पीछे से आ रही मर्सिडीज-बेंज कार ने उनके स्कूटर को टक्कर मार दी। रिपोर्टों के अनुसार, टक्कर के कारण उनकी मौके पर ही मौत हो गई। शुरुआती जांच में कार की तेज रफ्तार की आशंका जताई गई है। हालांकि, दुर्घटना की सटीक परिस्थितियों और वाहन की गति की पुष्टि जांच में जुटाए गए साक्ष्यों से होनी है।
जयबालकृष्णन की मौत के बाद उनके परिवार ने मामले में सख्त कार्रवाई की मांग की। परिजनों ने यह भी सवाल उठाया कि नाबालिग को कार चलाने की अनुमति कैसे मिली और शुरुआती पुलिस कार्रवाई में गंभीर आरोप क्यों नहीं लगाए गए।
नाबालिग को पहले जमानत, फिर बदली गई कार्रवाई
रिपोर्टों के अनुसार, पुलिस ने शुरुआत में किशोर के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 281 और 106(1) के तहत मामला दर्ज किया था। ये प्रावधान क्रमशः सार्वजनिक मार्ग पर लापरवाही से वाहन चलाने और लापरवाही से मौत होने से संबंधित हैं। किशोर को उसी दिन पुलिस स्टेशन से जमानत पर छोड़ा गया।
इसके बाद मृतक के परिजनों और स्थानीय लोगों ने थाने के बाहर विरोध प्रदर्शन किया। पुलिस ने किशोर को दोबारा हिरासत में लिया और मामले में BNS की धारा 105, यानी गैर-इरादतन हत्या की श्रेणी में आने वाले अपराध से संबंधित प्रावधान, भी जोड़ा। उसे किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष पेश किया गया, जहां से उसे फिर जमानत मिल गई।
यहां कानूनी स्थिति समझना जरूरी है: किशोर को जमानत मिलना आरोपों से बरी होना नहीं है। पुलिस की जांच और अदालत की प्रक्रिया अलग-अलग चलती हैं। जमानत रद्द करने की मांग पर भी न्यायिक निर्णय होना बाकी है।
न्यायाधीश पिता के घर क्यों हुई तलाशी?
कार न्यायिक अधिकारी के नाम पर पंजीकृत थी। इसी आधार पर पुलिस ने मोटर वाहन अधिनियम की धारा 199A के तहत उनके खिलाफ मामला दर्ज किया। यह प्रावधान निर्धारित परिस्थितियों में नाबालिग द्वारा वाहन से अपराध किए जाने पर वाहन के मालिक या अभिभावक की जिम्मेदारी से संबंधित है।
केरल हाई कोर्ट से आवश्यक अनुमति मिलने के बाद पुलिस ने न्यायाधीश के आवास की तलाशी ली। रिपोर्टों के मुताबिक, तलाशी के दौरान सीसीटीवी फुटेज, डिजिटल साक्ष्य और वाहन से संबंधित दस्तावेज जुटाए गए। एक महंगी मोटरसाइकिल भी जब्त की गई, जिसकी जांच इस संदेह के तहत की जा रही है कि किशोर उसका इस्तेमाल करता था।
जांचकर्ताओं के सामने यह पता लगाने की चुनौती है कि किशोर कार लेकर घर से कैसे निकला, क्या परिवार को इसकी जानकारी थी और वाहन के इस्तेमाल पर किसका नियंत्रण था। न्यायाधीश का पक्ष यह रहा है कि उनका बेटा उनकी जानकारी के बिना कार लेकर गया था। इस दावे की पुष्टि या खंडन जांच के बाद ही किया जा सकता है।
क्राइम ब्रांच ने न्यायाधीश से की पूछताछ
28 अक्टूबर को क्राइम ब्रांच ने न्यायाधीश को पूछताछ के लिए बुलाया और उनका बयान दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू की। ThePrint की PTI-आधारित रिपोर्ट के अनुसार, पूछताछ कई घंटे चली। इसके बाद 29 अक्टूबर को प्रकाशित द न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में बताया गया कि केरल हाई कोर्ट की प्रशासनिक समिति ने जांच जारी रहने तक न्यायाधीश के खिलाफ तत्काल विभागीय कार्रवाई पर फैसला टाल दिया।
हाई कोर्ट ने पुलिस को जांच आगे बढ़ाने की अनुमति दी है। साथ ही, यदि न्यायिक अधिकारी की गिरफ्तारी की जरूरत पड़ती है, तो संबंधित प्रक्रिया और सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों का पालन करने को कहा गया है। न्यायाधीश ने अग्रिम जमानत के लिए भी हाई कोर्ट का रुख किया है।
इन घटनाक्रमों से स्पष्ट है कि मामला केवल सड़क दुर्घटना की जांच तक सीमित नहीं रहा। अब वाहन के इस्तेमाल, अभिभावक की जिम्मेदारी और पुलिस की शुरुआती कार्रवाई की भी पड़ताल हो रही है।
पुलिस की कार्रवाई पर सवाल, चार कर्मियों को निलंबित किया गया
हादसे के शुरुआती चरण में पुलिस ने जिस तरह मामला दर्ज किया और किशोर को जमानत दी, उस पर सवाल उठे। केरल के गृह मंत्री रमेश चेन्निथला ने पुलिस की कार्रवाई में चूक स्वीकार करते हुए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कदम उठाने की बात कही।
रिपोर्टों के अनुसार, मामले में एक सर्किल इंस्पेक्टर, स्टेशन हाउस ऑफिसर, ग्रेड सब-इंस्पेक्टर और एक असिस्टेंट सिविल पुलिस ऑफिसर सहित चार पुलिसकर्मियों को निलंबित किया गया। जांच क्राइम ब्रांच को सौंपे जाने का उद्देश्य मामले के तथ्यों और शुरुआती कार्रवाई की स्वतंत्र रूप से पड़ताल करना है।
पुलिस की शुरुआती चूक पर कार्रवाई अपने आप में यह साबित नहीं करती कि किसी आरोपी को जानबूझकर बचाया गया था। यह तय करने के लिए जांच में सामने आने वाले दस्तावेज, अधिकारियों के निर्णय और संबंधित साक्ष्य महत्वपूर्ण होंगे।
अब आगे क्या होगा?
29 अक्टूबर की रिपोर्ट के मुताबिक, पुलिस किशोर को मिली जमानत रद्द कराने की मांग लेकर अदालत पहुंची थी। अदालत ने इस आवेदन पर अगली सुनवाई के लिए 30 अक्टूबर 2026 की तारीख तय की थी। इसके अलावा, न्यायाधीश की भूमिका, कार के इस्तेमाल की परिस्थितियों और डिजिटल रिकॉर्ड की जांच जारी है।
इस मामले में मृतक के परिवार की न्याय की मांग के साथ-साथ किशोर न्याय कानून, वाहन मालिक की जिम्मेदारी और न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ जांच की प्रक्रिया भी अहम है। अंतिम निष्कर्ष साक्ष्यों और अदालत की सुनवाई के आधार पर ही सामने आएगा।
सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या जांच यह स्पष्ट कर पाएगी कि हादसे से पहले कार कैसे और किन परिस्थितियों में निकाली गई, और क्या किसी स्तर पर कानून का पालन करने में चूक हुई?