इस खबर में एक जरूरी फर्क स्पष्ट रखना होगा: किसी इलाके में प्रदूषण की स्थिति खराब बताना और वहां के प्रदूषण का वैज्ञानिक स्रोत-विश्लेषण करना दो अलग बातें हैं। रिपोर्ट के निष्कर्ष, अध्ययन की अवधि और मापे गए प्रदूषकों के आंकड़े देखे बिना किसी एक कारण को पूरे प्रदूषण के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए।
रिपोर्ट में क्या सामने आया?
CSIR–भारतीय विषविज्ञान अनुसंधान संस्थान (IITR) ने सितंबर-अक्टूबर 2026 में आठ सप्ताह तक लखनऊ के नौ स्थानों पर वायु गुणवत्ता की निगरानी की। इसमें चार आवासीय, चार व्यावसायिक और एक औद्योगिक क्षेत्र शामिल था। रिपोर्ट के अनुसार, सभी नौ निगरानी स्थलों पर PM10 और PM2.5 का 24 घंटे का औसत राष्ट्रीय मानकों से ऊपर मिला।
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निगरानी क्षेत्र PM10 PM2.5
अमौसी (औद्योगिक) 188.5 93.5
चारबाग (व्यावसायिक) 157.2 81.6
इंदिरानगर (आवासीय) 126.5 68.6
मात्रा: माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर; 24 घंटे का औसत।
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रिपोर्ट में राष्ट्रीय मानक PM10 के लिए 100 और PM2.5 के लिए 60 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर बताए गए हैं। इस हिसाब से चारबाग और इंदिरानगर दोनों में दोनों प्रदूषकों का स्तर निर्धारित सीमा से अधिक रहा। हालांकि, शहर में सबसे अधिक औसत प्रदूषण अमौसी औद्योगिक क्षेत्र में दर्ज हुआ।
खुदाई और निर्माण कार्यों से बढ़ रही धूल
रिपोर्ट में अंडरपास निर्माण, सड़कों और फुटपाथों का काम, केबल तथा पानी की पाइपलाइन बिछाने के लिए खुदाई और अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को धूल बढ़ने के प्रमुख कारणों में गिना गया है। निर्माण स्थलों से निकलने वाली मिट्टी और मलबा हवा में उड़ता है। सड़क पर जमा धूल वाहनों की आवाजाही से दोबारा हवा में फैलती है।
ट्रैफिक और वाहनों का दबाव भी चिंता का विषय
शहर में वाहनों की संख्या और यातायात का दबाव बढ़ने से प्रदूषण की चुनौती गंभीर हो रही है। मार्च 2026 तक लखनऊ में पंजीकृत वाहनों की संख्या 31.99 लाख बताई गई, जो एक साल में 4.9 प्रतिशत बढ़ी। जाम में धीमी गति से चलने और बार-बार रुकने वाले वाहनों से निकलने वाला धुआँ भी हवा की गुणवत्ता को प्रभावित करता है।
पांच साल के रिकॉर्ड में एक महत्वपूर्ण पहलू
रिपोर्ट में प्रदूषण के पिछले पांच वर्षों के रुझान का भी उल्लेख है। 2026 में पिछले साल की तुलना में PM10 और PM2.5 में बढ़ोतरी दर्ज हुई, लेकिन संस्थान के आकलन के अनुसार मौजूदा स्तर 2022 के चरम स्तर से नीचे हैं। यानी ताजा बढ़ोतरी चिंताजनक है, मगर इसे अब तक के सबसे खराब स्तर के रूप में पेश करना सही नहीं होगा।
IITR ने क्या उपाय सुझाए?
रिपोर्ट में प्रदूषण कम करने के लिए कई उपायों पर जोर दिया गया है:
- निर्माण स्थलों पर धूल रोकने के लिए HDPE नेट और बैरिकेडिंग लगाई जाए।
- सड़क निर्माण और खुदाई का काम संभव हो तो कम यातायात वाले समय में कराया जाए।
- सड़कों की नियमित मैकेनाइज्ड सफाई और पानी का छिड़काव हो।
- निर्माण सामग्री और मलबे को खुले में न छोड़ा जाए।
- CNG और इलेक्ट्रिक वाहनों के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया जाए।
- कचरा, प्लास्टिक और जैविक अवशेष खुले में जलाने पर सख्ती से रोक लगे।
स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ सकता है?
IITR के निदेशक भास्कर नारायण के मुताबिक, PM2.5 के बेहद छोटे कण फेफड़ों के भीतर तक पहुंच सकते हैं। लंबे समय तक इनके संपर्क में रहने से फेफड़ों में सूजन, सांस संबंधी परेशानी, ब्रोंकाइटिस और हृदय संबंधी बीमारियों का जोखिम बढ़ सकता है।इसलिए निर्माण स्थलों के आसपास रहने वाले लोगों, सड़क किनारे काम करने वालों, ट्रैफिक पुलिसकर्मियों और रोजाना लंबे समय तक सफर करने वालों के लिए धूल और धुएं से बचाव महत्वपूर्ण है।