उत्तर प्रदेश के पीलीभीत सदर विधानसभा क्षेत्र में मतदाता सूची को लेकर शुरू हुआ विवाद अब प्रशासनिक जांच से निकलकर सियासी टकराव का रूप ले चुका है। Special Intensive Revision यानी SIR के बाद मतदाता विवरण में बदलाव के आरोपों को लेकर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने गंभीर सवाल उठाए हैं। विपक्षी दलों का आरोप है कि कई मतदाताओं के EPIC नंबर और serial number वही रहने के बावजूद नाम और अन्य विवरण बदल गए, और इनमें बड़ी संख्या में मुस्लिम मतदाताओं के प्रभावित होने का दावा किया गया है।
दूसरी ओर, चुनाव प्रशासन ने शिकायतों को नजरअंदाज करने के बजाय मामले की विस्तृत जांच कराई। जांच में पीलीभीत सदर सीट पर 10,470 approved Form-8 entries में irregularities मिलने की पुष्टि की गई है। इसके बाद दो Electoral Registration Officers के खिलाफ कार्रवाई और एक कंप्यूटर सहायक की सेवा समाप्त करने के साथ FIR भी दर्ज की गई है। प्रशासन ने अब इन entries को prescribed procedure के अनुसार सुधारने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।
SIR के बाद क्या बदला, जिस पर उठे सवाल?
पीलीभीत का विवाद उस समय सामने आया जब कुछ मतदाताओं ने अपने EPIC नंबर online search किए और पाया कि उनके voter ID number के साथ किसी दूसरे व्यक्ति का नाम या विवरण दिखाई दे रहा था।
ऐसी ही शिकायत अधिवक्ता फैजान अली खान ने की। उनका कहना था कि अंतिम मतदाता सूची में उनका नाम और उनके भाई का नाम मौजूद था, लेकिन EPIC नंबर की जांच करने पर अलग-अलग नाम दिखाई दिए। उन्होंने चुनाव अधिकारियों को शिकायत देकर यह सवाल उठाया कि final roll प्रकाशित होने और दस्तावेजों के सत्यापन के बाद रिकॉर्ड कैसे बदल गया।
इसी तरह कांग्रेस और SP नेताओं ने दावा किया कि कई मामलों में EPIC और serial numbers unchanged रहे, लेकिन voter details बदल गईं। विपक्ष का कहना है कि ऐसी स्थिति मतदान के दिन genuine voter के सामने पहचान और रिकॉर्ड mismatch की समस्या पैदा कर सकती है।
SP-Congress ने लगाया Targeting का आरोप
मामले ने राजनीतिक रंग तब पकड़ा जब समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने दावा किया कि कथित बदलावों का असर disproportionately मुस्लिम मतदाताओं पर पड़ा।
SP के प्रदेश प्रवक्ता उदयवीर सिंह ने कहा कि पार्टी को आशंका है कि समस्या केवल पीलीभीत तक सीमित नहीं है और वह उत्तर प्रदेश की करीब 100 विधानसभा सीटों में voter rolls की जांच करेगी। कांग्रेस ने भी सभी 75 जिला कांग्रेस कमेटियों को अपने-अपने क्षेत्रों में electoral rolls verify करने का निर्देश देने की बात कही है।
पीलीभीत में कांग्रेस नेताओं ने इससे भी बड़ा आंकड़ा सामने रखा है। पार्टी ने अपने booth-level verification के आधार पर 13,150 से अधिक altered entries और अन्य कथित discrepancies का दावा किया है। स्थानीय कांग्रेस नेताओं के अनुसार उनकी टीमों ने करीब 3.48 लाख मतदाताओं के रिकॉर्ड की जांच की।
हालांकि, यह आंकड़ा चुनाव प्रशासन द्वारा सत्यापित 10,470 irregular approved Form-8 entries से अलग है। इसलिए दोनों आंकड़ों को एक ही श्रेणी का आधिकारिक आंकड़ा मानना सही नहीं होगा।
EC की जांच में सामने आया 13,779 Form-8 का रिकॉर्ड
उत्तर प्रदेश के Chief Electoral Officer नवदीप रिणवा के कार्यालय के मुताबिक, 31 मई से 29 अगस्त 2026 के बीच पीलीभीत सदर के Voter Registration Centre में कुल 13,779 Form-8 applications दर्ज की गईं।
इनमें:
10,470 applications approved
3,309 applications rejected
जांच में पाया गया कि approved 10,470 entries से जुड़े physical forms और supporting documents उपलब्ध नहीं थे। जांच रिपोर्ट के मुताबिक सभी 10,470 approved entries में irregularities मिलीं।
यही वह बिंदु है जहां राजनीतिक आरोप और प्रशासनिक जांच एक-दूसरे से जुड़ते हैं। प्रशासन ने irregularities को स्वीकार करते हुए अब corrective action शुरू कर दिया है, लेकिन इससे अपने आप यह साबित नहीं होता कि सभी बदलाव किसी राजनीतिक targeting के उद्देश्य से किए गए थे।
अधिकारियों पर FIR, कंप्यूटर सहायक की सेवा समाप्त
मामले की जांच के बाद चुनाव प्रशासन ने दो Electoral Registration Officers के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू की है। संबंधित अधिकारियों को जिला मुख्यालय से संबद्ध किया गया है।
वहीं Voter Registration Centre के कंप्यूटर सहायक अनिल कुमार की सेवा समाप्त कर दी गई है।
तीनों के खिलाफ FIR भी दर्ज की गई है। मामले में Representation of the People Act, 1950 की Section 32 और संबंधित BNS provisions के तहत कार्रवाई की गई है।
हालांकि, FIR में लगाए गए आरोपों और प्रत्येक व्यक्ति की व्यक्तिगत जिम्मेदारी का अंतिम निर्धारण जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगा।
अब EC क्या कर रहा है?
इस मामले में प्रशासन का अगला बड़ा कदम irregular Form-8 entries को rectify करना है।
जिला निर्वाचन अधिकारी ने सभी 10,470 approved Form-8 entries की fresh verification के निर्देश दिए हैं। यानी प्रत्येक record को दोबारा देखा जाएगा ताकि यह पता लगाया जा सके कि उसमें क्या बदलाव हुआ, वह बदलाव किस आधार पर किया गया और voter का सही विवरण क्या है।
इसके साथ ही चुनाव प्रशासन ने यह भी निर्देश दिया है कि संबंधित कंप्यूटर सहायक द्वारा 10 अप्रैल से 21 अक्टूबर के बीच दर्ज किए गए Form-6 और Form-7 applications की भी जांच की जाए। Form-6 voter list में नाम जोड़ने और Form-7 नाम हटाने/आपत्ति से जुड़ी प्रक्रिया में इस्तेमाल होता है।
जांच अब सिर्फ Pilibhit Sadar तक सीमित नहीं
प्रशासन ने पीलीभीत की दूसरी विधानसभा सीटों को भी जांच के दायरे में लिया है।
पूरनपुर, बीसलपुर और बरखेड़ा विधानसभा क्षेत्रों की electoral rolls की भी जांच के निर्देश दिए गए हैं। इससे यह पता लगाने की कोशिश होगी कि क्या ऐसी irregularities केवल Pilibhit Sadar में हुईं या जिले के दूसरे हिस्सों में भी voter-data processing में ऐसी समस्याएं सामने आती हैं।
इसके अलावा UP CEO ने सभी जिलों के District Election Officers को भी अपने-अपने क्षेत्रों की electoral rolls में आवश्यक scrutiny और correction सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं।
क्या यह साबित हो गया कि मुस्लिम मतदाताओं को जानबूझकर Target किया गया?
अभी नहीं।
यह इस पूरे मामले की सबसे महत्वपूर्ण बात है।
SP और Congress का आरोप है कि कथित तौर पर बदले गए voter details में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या अधिक है, और इससे उन्हें चुनाव के समय मतदान से वंचित होने का खतरा हो सकता है। लेकिन अभी तक चुनाव प्रशासन की जांच ने यह आधिकारिक निष्कर्ष नहीं दिया है कि रिकॉर्ड बदलाव किसी विशेष समुदाय को target करने की साजिश के तहत किए गए थे।
प्रशासन ने फिलहाल जो स्थापित किया है, वह है electoral records में irregularities और procedural lapses। अब जांच और corrective process से यह स्पष्ट होना बाकी है कि ये बदलाव कैसे हुए, किसने किए और क्या इनके पीछे कोई सुनियोजित उद्देश्य था।
2027 चुनाव से पहले क्यों महत्वपूर्ण है मामला?
पीलीभीत का मामला इसलिए भी राजनीतिक रूप से संवेदनशील है क्योंकि उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव होने हैं।
2022 में Pilibhit Sadar सीट पर BJP के संजय सिंह गंगवार ने करीब 6,930 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की थी। विपक्ष का कहना है कि अगर किसी विधानसभा क्षेत्र में हजारों मतदाताओं के नाम या विवरण में गड़बड़ी हो तो उसका सीधा असर चुनावी प्रक्रिया पर पड़ सकता है।
हालांकि, किसी voter-list irregularity को सीधे चुनाव परिणाम बदलने से जोड़ना अभी उचित नहीं है। इसके लिए यह साबित करना होगा कि कितने genuine voters प्रभावित हुए, कितने records गलत तरीके से बदले गए और क्या इसका मतदान या चुनाव परिणाम पर वास्तविक प्रभाव पड़ा।
अब राजनीतिक और प्रशासनिक लड़ाई दोनों जारी
एक तरफ SP और Congress ने मामले को बड़े चुनावी मुद्दे के रूप में उठाना शुरू कर दिया है। कांग्रेस ने statewide verification की बात कही है, जबकि SP ने भी दूसरे विधानसभा क्षेत्रों में voter rolls की जांच करने का ऐलान किया है।
दूसरी तरफ चुनाव प्रशासन ने FIR, departmental proceedings, record verification और correction की प्रक्रिया शुरू कर दी है।
BJP ने भी कहा है कि electoral rolls की accuracy बनाए रखना सभी राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी है और अगर किसी ने जानबूझकर बदलाव किए हैं तो जांच के बाद कार्रवाई होनी चाहिए।
इसलिए फिलहाल मामला दो समानांतर सवालों पर टिका है—क्या voter records में बड़े पैमाने पर procedural manipulation हुई और क्या इसके पीछे किसी को राजनीतिक रूप से target करने की मंशा थी?
पहले सवाल पर प्रशासनिक जांच में गंभीर irregularities सामने आ चुकी हैं। दूसरे सवाल का जवाब अभी जांच और आगे की कार्रवाई से ही मिलेगा।
अब आगे क्या होगा?
आने वाले दिनों में सबसे महत्वपूर्ण होगा 10,470 approved Form-8 entries की fresh verification का परिणाम।
अगर जांच में गलत बदले गए records की पहचान होती है, तो उन्हें निर्धारित नियमों के अनुसार correct किया जाएगा। साथ ही Form-6 और Form-7 की जांच यह बताएगी कि voter inclusion और deletion की प्रक्रिया में भी कोई अनियमितता हुई थी या नहीं।
इसके बाद यह भी महत्वपूर्ण होगा कि जांच में किस स्तर पर जिम्मेदारी तय होती है और क्या किसी सुनियोजित manipulation के सबूत मिलते हैं।
फिलहाल इतना स्पष्ट है कि पीलीभीत का voter-data विवाद अब सिर्फ राजनीतिक आरोप नहीं रहा है। चुनाव प्रशासन ने खुद 10,470 approved entries में irregularities की पुष्टि की है और उन्हें सुधारने की कार्रवाई शुरू कर दी है। लेकिन SP-Congress का यह आरोप कि इन बदलावों के पीछे किसी समुदाय को target करने की मंशा थी, अभी राजनीतिक आरोप/जांच का विषय है, स्थापित तथ्य नहीं।