Skip to content
24/7 News Uttar Pradesh
Breaking

पितृ विसर्जन के दौरान इन बातों का रखें विशेष ध्यान

पितृ पक्ष की अमावस्या पर तर्पण और पिंडदान करते समय छोटी सी चूक भी पूजा का फल बिगाड़ सकती है

नदी किनारे पितृ विसर्जन के लिए तर्पण करता हुआ व्यक्ति

सर्वपितृ अमावस्या पर पितृ विसर्जन को पितृ पक्ष का सबसे महत्वपूर्ण दिन माना जाता है। इस दिन पूर्वजों को जल और अन्न अर्पित कर विदाई दी जाती है। धार्मिक मान्यता है कि इस अनुष्ठान में की गई छोटी सी लापरवाही भी पूजा के फल को प्रभावित कर सकती है।

पंडितों के अनुसार पितृ विसर्जन का सबसे उपयुक्त समय अपराह्न काल यानी दोपहर के बाद का होता है। इसे कुतुप और रौहिण काल भी कहा जाता है, जो तर्पण और पिंडदान के लिए सबसे शुभ माना गया है।

तर्पण की सामग्री और विधि

तर्पण में काले तिल, जौ, कुश और गंगाजल का प्रयोग अनिवार्य बताया जाता है। हाथ में कुश की अंगूठी यानी पवित्री पहनकर ही जल अर्पित करना चाहिए।

जल हमेशा दक्षिण दिशा की ओर मुख करके अर्पित करना चाहिए, क्योंकि इसे पितरों की दिशा माना गया है। तर्पण के समय हाथ की अंगुलियों के बीच से जल गिरना ज़रूरी होता है, जिसे पितृ तीर्थ कहा जाता है।

शुद्धता और आचरण का महत्व

पितृ विसर्जन से पहले स्नान कर स्वच्छ और सफेद या पीले वस्त्र धारण करने की परंपरा है। घर और पूजा स्थल की साफ-सफाई का भी विशेष ख़याल रखा जाता है।

इस दिन मांस, मदिरा और तामसिक भोजन से पूरी तरह दूरी बनाने की सलाह दी जाती है। लहसुन-प्याज जैसे तामसिक पदार्थों से बने भोजन को भी वर्जित माना गया है।

विसर्जन के दौरान क्रोध, वाद-विवाद और नकारात्मक बातों से बचना चाहिए। शांत मन और श्रद्धा के साथ ही अनुष्ठान पूर्ण करने की सीख दी जाती है।

पिंडदान और दान-पुण्य

पिंडदान में चावल, जौ के आटे और तिल से बने पिंड अर्पित किए जाते हैं। यह अनुष्ठान परिवार के सबसे बड़े पुत्र या निकटतम पुरुष सदस्य द्वारा किया जाता है।

पितृ विसर्जन के दिन ब्राह्मण भोजन और दान का विशेष महत्व बताया गया है। वस्त्र, अन्न और दक्षिणा का दान पितरों की तृप्ति के लिए किया जाता है।

कौआ, गाय और कुत्ते को भोजन कराने की भी परंपरा है, क्योंकि इन्हें पितरों का प्रतीक माना जाता है। भोजन का पहला हिस्सा इन्हें अर्पित करने के बाद ही परिवार भोजन ग्रहण करता है।

इन बातों से बचना ज़रूरी

पितृ विसर्जन के दिन नए कार्यों की शुरुआत, मांगलिक आयोजन और बाल-नाखून कटवाने से बचने की सलाह दी जाती है। इसे शोक और श्रद्धा का दिन माना जाता है, इसलिए उल्लास वाले कार्यक्रमों को टाला जाता है।

लोहे के बर्तनों के बजाय तांबे या मिट्टी के पात्र में जल अर्पित करना शुभ माना गया है। तर्पण और पिंडदान के दौरान मौन रहकर मंत्रोच्चार करने की परंपरा है।

धार्मिक मान्यता है कि सही विधि और श्रद्धा से किया गया पितृ विसर्जन परिवार में सुख-समृद्धि लाता है। इसी कारण हर साल लाखों लोग पितृ पक्ष के दौरान इन नियमों का पालन करते हैं।