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यूपी में मरीजों से लूट, 74 का इंजेक्शन 4980 में बिका

जांच में दवाओं और उपकरणों की खरीद कीमत और एमआरपी में भारी अंतर सामने आया

अस्पताल की फार्मेसी में दवाओं की ऊंची कीमत से परेशान मरीज का तीमारदार
प्रतीकात्मक तस्वीर, AI से बनाई गई। यह वास्तविक घटना का चित्रण नहीं है।

उत्तर प्रदेश में मरीजों से खुलेआम लूट का मामला सामने आया है। जांच में पता चला कि 74 रुपये कीमत का एक इंजेक्शन मरीजों को 4980 रुपये में बेचा गया।

यह खुलासा दवाओं और मेडिकल उपकरणों की कीमतों की जांच में हुआ है। विभागीय पड़ताल में खरीद मूल्य और बिक्री मूल्य के बीच कई गुना अंतर मिला है।

उपकरणों में भी भारी अंतर

जांच में एक 3-तरफा स्टॉप कॉक की खरीद कीमत सिर्फ 6.40 रुपये थी। इसी उपकरण की एमआरपी 163 रुपये पाई गई, जो खरीद कीमत से करीब 25 गुना अधिक है।

एक अन्य मेडिकल उपकरण की खरीद कीमत 20.95 रुपये थी। इस पर एमआरपी 500 रुपये तय की गई थी, यानी करीब 24 गुना का अंतर।

विभागीय विश्लेषण में आशंका जताई गई है कि ऊंचे व्यापार लाभ और छूट की गुंजाइश बनाए रखने के लिए जानबूझकर एमआरपी ऊंची रखी जाती है।

निजी अस्पतालों में मोनोपॉली दवाओं का खेल

निजी अस्पतालों में मोनोपॉली दवाओं के जरिए भी मरीजों की जेब पर डाका डाला जा रहा है। फार्मेसी में ऐसी दवाएं रखी जाती हैं जो खुले बाजार में उपलब्ध नहीं होतीं।

ऐसी स्थिति में मरीजों को मजबूरन अस्पताल की फार्मेसी से ही दवा खरीदनी पड़ती है। अस्पताल इसी मजबूरी का फायदा उठाकर इन दवाओं पर अपेक्षाकृत ज्यादा एमआरपी रखते हैं।

दवा की उपलब्धता सीमित होने के कारण मरीज और तीमारदार उसके वास्तविक बाजार मूल्य से तुलना भी नहीं कर पाते। मजबूरी में दवा खरीदने से अंतिम बिल काफी बढ़ जाता है।