नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने GST लागू होने से पहले की कर व्यवस्था को लेकर राज्यों के अधिकारों पर चल रही लंबी कानूनी बहस में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि पुरानी बिक्री कर व्यवस्था के तहत राज्य सरकारों को पहले से लगाए गए बिक्री कर के आधार पर अतिरिक्त बिक्री कर, सरचार्ज या सेस लगाने का अधिकार था। इस व्यवस्था को सही ठहराने वाला 1974 का सुप्रीम कोर्ट का फैसला अब भी कानूनी रूप से प्रभावी है।
सात जजों की संविधान पीठ ने सुनाया फैसला
4 नवंबर 2026 को मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली सात सदस्यीय संविधान पीठ ने यह फैसला सुनाया। पीठ में जस्टिस के.वी. विश्वनाथन, एस.वी.एन. भट्टी, जॉयमाल्य बागची, एन.वी. अंजारिया, अरुण पल्ली और वी. मोहन शामिल थे।
अदालत के सामने सवाल था कि क्या राज्य सरकारें पहले से लागू बिक्री या खरीद कर की राशि के प्रतिशत के आधार पर अतिरिक्त कर, सरचार्ज या सेस लगा सकती हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसा अतिरिक्त कर मूल बिक्री कर की दर में बढ़ोतरी के समान है और पुरानी संवैधानिक व्यवस्था में यह राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आता था।
27 साल पुराने विवाद की शुरुआत कहां से हुई?
यह मामला Arjun Flour Mills बनाम State of Odisha से जुड़ा है। विवाद ओडिशा बिक्री कर अधिनियम, 1947 की धारा 5A के तहत लगाए गए अतिरिक्त कर को लेकर था।
इस प्रावधान के तहत:
- 10 लाख से 1 करोड़ रुपये तक सालाना कारोबार वाले कारोबारियों पर बिक्री कर के अतिरिक्त 10 प्रतिशत टैक्स लगाया गया था।
- 1 करोड़ रुपये से अधिक कारोबार वाले कारोबारियों पर 15 प्रतिशत अतिरिक्त टैक्स लगाया गया था।
इस व्यवस्था को चुनौती देते हुए सवाल उठाया गया था कि क्या राज्य सरकारों को ऐसा अतिरिक्त कर लगाने का अधिकार है या यह केंद्र के कराधिकार के दायरे में आता है। वर्ष 1999 में यह कानूनी सवाल सात जजों की पीठ के पास भेजा गया था।
1974 के फैसले को क्यों माना गया महत्वपूर्ण?
इस विवाद में सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले S. Kodar बनाम State of Kerala (1974) की अहम भूमिका रही। उस मामले में पांच जजों की संविधान पीठ ने बिक्री कर के आधार पर अतिरिक्त कर लगाने की व्यवस्था को वैध माना था।
अब सात जजों की पीठ ने स्पष्ट किया कि उस फैसले में निर्धारित कानूनी सिद्धांत आज भी प्रभावी है। अदालत के मुताबिक, यदि अतिरिक्त टैक्स की गणना देय बिक्री कर के प्रतिशत के आधार पर होती है, तो उसका स्वरूप बिक्री कर का ही रहता है।
GST लागू होने के बाद क्या बदलेगा?
यहां फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू समझना जरूरी है। भारत में 1 जुलाई 2017 से GST व्यवस्था लागू हो चुकी है। इसके बाद पुरानी बिक्री कर व्यवस्था से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों और कई राज्य कानूनों को बदल दिया गया या उनकी जगह नई व्यवस्था ने ले ली।
इसी कारण सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लगभग 27 साल पहले उसके सामने भेजा गया कानूनी सवाल अब वर्तमान कर व्यवस्था में व्यावहारिक महत्व नहीं रखता। इसलिए सात जजों की पीठ ने उस संदर्भ को अकादमिक और निष्प्रभावी मानते हुए निपटा दिया।
कारोबारियों और राज्यों पर क्या होगा असर?
इस फैसले का महत्व मुख्य रूप से उन पुराने कर विवादों में हो सकता है, जो GST लागू होने से पहले के अतिरिक्त बिक्री कर, सरचार्ज या सेस से संबंधित हैं। ऐसे मामलों में राज्य सरकारें 1974 के फैसले का हवाला दे सकती हैं।
हालांकि इसका यह मतलब नहीं है कि पुराने कर से जुड़े हर विवाद का फैसला अपने आप राज्य सरकारों के पक्ष में हो जाएगा। किसी मामले में टैक्स की गणना, छूट, समय-सीमा और वसूली की वैधता जैसे मुद्दों पर अलग से विचार किया जा सकता है।
सबसे अहम बात: यह फैसला राज्यों को मौजूदा GST व्यवस्था के बाहर मनमाने ढंग से नया सरचार्ज लगाने की खुली अनुमति नहीं देता। इसका संबंध मुख्य रूप से GST से पहले लागू बिक्री कर व्यवस्था और उससे जुड़े पुराने कानूनी विवादों से है।