उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) में कथित धर्मांतरण और महिला डॉक्टरों-कर्मचारियों के उत्पीड़न से जुड़े मामले में उत्तर प्रदेश स्पेशल टास्क फोर्स (STF) की जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद हलचल तेज हो गई है। रिपोर्ट में विश्वविद्यालय के एक दर्जन से अधिक डॉक्टरों और कर्मचारियों की कथित भूमिका का उल्लेख किया गया है। आरोप है कि संस्थान के अलग-अलग विभागों में महिला रेजिडेंट डॉक्टरों, नर्सिंग स्टाफ और संविदा कर्मचारियों को अनुचित संबंधों में फंसाने, धर्म परिवर्तन के लिए दबाव बनाने और शिकायत करने पर धमकाने जैसी घटनाएं हुईं।
STF ने अपनी जांच रिपोर्ट 25 अगस्त 2026 को शासन को सौंपी थी। इसके आधार पर चिकित्सा शिक्षा विभाग ने 30 अक्टूबर को KGMU प्रशासन को संबंधित लोगों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई करने का निर्देश दिया। अब विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद की 6 नवंबर को प्रस्तावित बैठक में रिपोर्ट पर विचार और अनुशासनात्मक जांच समितियों के गठन का प्रस्ताव रखा जाएगा।
एक दर्जन से अधिक डॉक्टरों और कर्मचारियों की भूमिका का उल्लेख
STF की जांच रिपोर्ट को लेकर प्रकाशित अलग-अलग समाचार रिपोर्टों में नामों की संख्या अलग-अलग बताई गई है। NDTV की रिपोर्ट में 12 लोगों के नाम शामिल होने की बात कही गई है, जबकि लाइव हिन्दुस्तान ने करीब 13 डॉक्टरों के खिलाफ अनुशासनात्मक जांच की तैयारी की जानकारी दी है।
अमर उजाला की 2 नवंबर की रिपोर्ट के अनुसार, STF ने सर्विलांस, पीड़ितों के बयान और अन्य साक्ष्यों के आधार पर जांच की थी। रिपोर्ट में डॉक्टरों के अलावा अन्य कर्मचारियों की भूमिका का भी उल्लेख है।
हालांकि, रिपोर्ट में किसी का नाम आना अपने आप में अपराध सिद्ध होना नहीं है। संबंधित व्यक्तियों की भूमिका और आरोपों की सत्यता का निर्धारण अलग-अलग विभागीय और कानूनी जांच के बाद ही होगा।
चार विभागों से जुड़े मामलों की जांच
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, STF ने KGMU के चार प्रमुख विभागों और उनसे जुड़े मामलों का उल्लेख किया है:
- पैथोलॉजी विभाग: रेजिडेंट डॉक्टरों से जुड़ी शिकायतें और कथित उत्पीड़न।
- गांधी वार्ड: नर्सिंग कर्मचारियों और रेजिडेंट डॉक्टरों से संबंधित आरोप।
- माइक्रोबायोलॉजी विभाग: संविदा पर काम करने वाली महिला कर्मचारी की शिकायत।
- रेडियोलॉजी विभाग: महिला कर्मचारियों और रेजिडेंट डॉक्टरों से जुड़े कथित अनुचित व्यवहार के मामले।
जांच रिपोर्ट में आरोप है कि कुछ महिला कर्मचारियों ने शिकायत की तो उनकी बात को गंभीरता से लेने के बजाय उन्हें डराने या चुप कराने की कोशिश की गई। कुछ मामलों में करियर खराब करने, नौकरी से हटाने और मानसिक रूप से अस्वस्थ बताने जैसी धमकियों का भी उल्लेख है।
डॉ. रमीज का मामला बना जांच का प्रमुख आधार
इस पूरे प्रकरण में पैथोलॉजी विभाग के रेजिडेंट डॉक्टर डॉ. रमीज से जुड़ा मामला भी महत्वपूर्ण है।
रिपोर्टों के अनुसार, महिला रेजिडेंट डॉक्टर डॉ. देवव्रती मिश्रा की शिकायत पर 23 दिसंबर 2025 को लखनऊ के चौक थाने में मुकदमा दर्ज किया गया था। आरोप था कि डॉ. रमीज ने महिला डॉक्टर को कथित तौर पर संबंध में फंसाकर धर्म परिवर्तन और शादी के लिए दबाव बनाया।
इसके बाद 9 जनवरी 2026 को डॉ. रमीज को गिरफ्तार किया गया था। इस मामले की पुलिस विवेचना अलग से जारी है। STF की व्यापक जांच में इसी तरह की अन्य शिकायतों और संस्थान के भीतर कथित सहयोगियों की भूमिका को भी शामिल किया गया।
शिकायत करने वाली महिलाओं को ही नौकरी से हटाने का आरोप
STF रिपोर्ट में एक संविदा महिला कर्मचारी की शिकायत का भी उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, माइक्रोबायोलॉजी विभाग में कार्यरत महिला कंप्यूटर ऑपरेटर ने एक वरिष्ठ कर्मचारी पर उत्पीड़न और धर्म परिवर्तन के लिए दबाव बनाने के आरोप लगाए थे।
शिकायत के बाद जांच समिति गठित किए जाने की बात कही गई, लेकिन रिपोर्ट में आरोप है कि संबंधित कर्मचारी के खिलाफ अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई और शिकायतकर्ता की संविदा समाप्त कर दी गई।
एक अन्य मामले में महिला रेजिडेंट डॉक्टरों ने कथित तौर पर वरिष्ठ डॉक्टरों पर शिकायत दबाने और परीक्षा तथा करियर प्रभावित करने की धमकी देने के आरोप लगाए। ये सभी आरोप जांच रिपोर्ट में दर्ज शिकायतों पर आधारित हैं।
एरा मेडिकल कॉलेज से भी जुड़े तार होने का दावा
अमर उजाला की 2 नवंबर की रिपोर्ट में STF जांच के हवाले से एरा मेडिकल कॉलेज से जुड़े कुछ संदर्भों का भी उल्लेख किया गया है।
रिपोर्ट के अनुसार, KGMU के कुछ डॉक्टरों के निजी मेडिकल संस्थान में आर्थिक निवेश और पूर्व विभागीय पदाधिकारियों के संपर्कों की भी पड़ताल की गई। STF ने कथित नेटवर्क और संस्थान के भीतर कुछ लोगों के प्रभाव को लेकर सवाल उठाए हैं।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि KGMU में कथित धर्मांतरण से जुड़ी घटनाओं का बड़ा हिस्सा 2006 से 2012 के बीच हुआ। हालांकि, इन आरोपों और संबंधित व्यक्तियों की भूमिका की स्वतंत्र पुष्टि तथा कानूनी निष्कर्ष अभी बाकी हैं।
शासन ने KGMU प्रशासन को दिए कार्रवाई के निर्देश
STF रिपोर्ट के बाद चिकित्सा शिक्षा विभाग के संयुक्त सचिव आनंद कुमार त्रिपाठी ने 30 अक्टूबर को KGMU के कुलसचिव को पत्र भेजा।
इसमें संबंधित डॉक्टरों और कर्मचारियों के खिलाफ KGMU अधिनियम, 2002 और KGMU परिनियमावली, 2011 के तहत आवश्यक कार्रवाई करने और उसकी विस्तृत रिपोर्ट शासन को भेजने का निर्देश दिया गया।
यह कदम प्रशासनिक कार्रवाई की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि, STF रिपोर्ट में नामित सभी लोगों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज करने की सिफारिश किए जाने की बात सही नहीं है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, STF ने मुख्य रूप से अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए मामला विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने रखा है।
6 नवंबर की बैठक में तय होगी आगे की कार्रवाई
KGMU के प्रवक्ता डॉ. केके सिंह के अनुसार, मामले को लेकर 6 नवंबर को विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद की बैठक प्रस्तावित है। इसमें STF की रिपोर्ट रखी जाएगी और संबंधित डॉक्टरों तथा कर्मचारियों के खिलाफ अलग-अलग अनुशासनात्मक जांच समितियां गठित करने के प्रस्ताव पर विचार होगा।
बैठक में यह भी तय किया जा सकता है कि जांच पूरी होने तक संबंधित डॉक्टरों की विभागीय और प्रशासनिक जिम्मेदारियों को लेकर क्या कदम उठाए जाएं।
अब इस मामले में निगाहें 6 नवंबर की बैठक पर टिकी हैं। यह बैठक तय करेगी कि जांच किस प्रक्रिया से आगे बढ़ेगी और संबंधित लोगों के खिलाफ विभागीय स्तर पर क्या कार्रवाई होगी।