सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला, उम्रकैद की सजा पर क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि एक ही मुकदमे में किसी व्यक्ति को अलग-अलग अपराधों के लिए कई बार उम्रकैद की सजा दी जाती है, तो उन सजाओं को एक के बाद एक लगातार चलाने का निर्देश नहीं दिया जा सकता। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि अदालत कई अपराधों के लिए अलग-अलग उम्रकैद की सजाएं नहीं दे सकती या एक सजा में राहत मिलते ही दूसरी सजा भी अपने-आप समाप्त हो जाएगी।
यह फैसला राजू शांताराम कोली बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में 27 अक्टूबर 2026 को सुनाया गया। न्यायमूर्ति के. वी. विश्वनाथन और न्यायमूर्ति अरुण पल्ली की पीठ ने स्पष्ट किया कि एक ही मुकदमे में दी गई कई उम्रकैद की सजाएं एक-दूसरे के ऊपर लागू होंगी। सक्षम प्राधिकारी द्वारा एक सजा में दी गई माफी या कमी का लाभ दूसरी सजा को अपने-आप नहीं मिलेगा।
मामला क्या था?
यह मामला वर्ष 2010 में महाराष्ट्र के ठाणे क्षेत्र में एक 12 वर्षीय बच्ची के साथ बलात्कार और हत्या से जुड़ा था। निचली अदालत ने वर्ष 2013 में आरोपी राजू शांताराम कोली को हत्या के लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत उम्रकैद सुनाई थी। इसके अलावा, बलात्कार और गलत तरीके से बंधक बनाने से संबंधित अपराधों के लिए भी उम्रकैद की सजा दी गई थी।
ट्रायल कोर्ट ने निर्देश दिया था कि दोनों उम्रकैद की सजाएं एक के बाद एक चलेंगी, यानी पहली सजा के बाद दूसरी सजा लागू होगी। बॉम्बे हाईकोर्ट ने वर्ष 2016 में इस निर्देश को बरकरार रखा था। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां दोषी की ओर से सजा के लगातार चलने के आदेश को चुनौती दी गई।
सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य कानूनी सवाल यह था कि क्या एक ही मुकदमे में अलग-अलग अपराधों के लिए दी गई उम्रकैद की सजाओं को लगातार चलाने का आदेश दिया जा सकता है।
अदालत ने पुराने फैसले का हवाला क्यों दिया?
सुप्रीम कोर्ट ने अपने 2016 के संविधान पीठ के फैसले मुथुरामलिंगम बनाम राज्य में निर्धारित कानूनी सिद्धांत को दोहराया। उस फैसले में स्पष्ट किया गया था कि कई अपराधों के लिए कई उम्रकैद की सजाएं दी जा सकती हैं, लेकिन उन्हें लगातार चलाने का निर्देश नहीं दिया जा सकता।
इसका आधार उम्रकैद की कानूनी प्रकृति है। उम्रकैद सामान्यतः दोषी के शेष प्राकृतिक जीवन तक कारावास का अर्थ रखती है, जब तक सक्षम प्राधिकारी कानून के अनुसार सजा में माफी या बदलाव न दे। ऐसे में एक ही व्यक्ति को दो अलग-अलग प्राकृतिक जीवन तक लगातार कैद में रखने का निर्देश व्यावहारिक और कानूनी रूप से उचित नहीं माना जाता।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कई उम्रकैद की सजाएं देने और उन्हें लगातार चलाने के आदेश में अंतर है। अदालत अलग-अलग अपराधों के लिए अलग-अलग सजाएं दे सकती है, लेकिन एक ही मुकदमे में दी गई उम्रकैद की सजाओं को एक के बाद एक चलाने का निर्देश नहीं दे सकती।
फिर दूसरी उम्रकैद का महत्व क्या रहेगा?
फैसले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यही है। अदालत ने स्पष्ट किया कि कई उम्रकैद की सजाएं एक-दूसरे के ऊपर लागू होंगी, लेकिन इससे वे कानूनी रूप से एक ही सजा में नहीं बदल जातीं।
उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति को हत्या के लिए उम्रकैद और दूसरे अपराध के लिए भी उम्रकैद दी गई है, तो अदालत उन्हें लगातार चलाने का निर्देश नहीं दे सकती। लेकिन यदि सक्षम प्राधिकारी एक अपराध की सजा में माफी या कमी देता है, तो उससे दूसरी उम्रकैद अपने-आप समाप्त नहीं होगी।
यानी सजा में राहत का निर्णय संबंधित अपराध और लागू कानूनी प्रावधानों के अनुसार देखा जाएगा। किसी एक सजा पर लिया गया फैसला दूसरे अपराध की सजा पर स्वतः लागू नहीं होगा। इसी कारण सुप्रीम कोर्ट ने दोनों सजाओं को अलग-अलग प्रभाव बनाए रखते हुए एक-दूसरे के ऊपर लागू करने का निर्देश दिया।
क्या आरोपी को बरी कर दिया गया?
नहीं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले को दोषसिद्धि खत्म होने या आरोपी के बरी होने के रूप में समझना गलत होगा।
अदालत ने अपील को केवल उस हिस्से में स्वीकार किया, जिसमें उम्रकैद की सजाओं को एक के बाद एक चलाने का निर्देश दिया गया था। लगातार सजा चलाने वाला आदेश रद्द कर दिया गया, लेकिन बाकी दोषसिद्धि और सजा संबंधी आदेश बरकरार रहे। इसमें अपराधों के लिए लगाई गई जुर्माने की सजा भी शामिल थी।
इसलिए इस फैसले का प्रभाव मुख्य रूप से सजा लागू करने के तरीके पर है, न कि अपराधों में दोषसिद्धि को खत्म करने पर।
क्या उम्रकैद का मतलब केवल 14 साल जेल है?
उम्रकैद को लेकर आम तौर पर यह भ्रम रहता है कि दोषी को 14 साल जेल में रहने के बाद स्वतः रिहा कर दिया जाता है। कानूनी स्थिति इससे अलग है।
उम्रकैद सामान्यतः दोषी के शेष प्राकृतिक जीवन तक कारावास को दर्शाती है। कुछ मामलों में लागू कानून, सजा में माफी या कमी की नीति और सक्षम प्राधिकारी के फैसले के आधार पर रिहाई संभव हो सकती है। लेकिन केवल 14 साल पूरे होने से हर उम्रकैद के मामले में स्वतः रिहाई का अधिकार नहीं बनता।
सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा फैसले में भी यही अंतर महत्वपूर्ण है। अदालत ने कई उम्रकैद की सजाओं को लगातार चलाने से रोका, लेकिन यह नहीं कहा कि दोषी को निश्चित अवधि के बाद रिहा कर देना चाहिए। सजा में किसी भी राहत का निर्णय लागू कानून और संबंधित प्राधिकारी के अधिकार क्षेत्र पर निर्भर करेगा।
फैसले का कानूनी महत्व क्या है?
यह निर्णय अदालतों के लिए सजा निर्धारित करने और उसके लागू होने के तरीके को लेकर एक महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण है। इससे यह स्पष्ट होता है कि कई अपराधों के लिए कई उम्रकैद की सजाएं देना और उन सजाओं को लगातार चलाने का आदेश देना दो अलग कानूनी बातें हैं।
साथ ही, फैसले ने यह भी रेखांकित किया कि किसी एक अपराध के संबंध में दी गई राहत का प्रभाव दूसरे अपराध की सजा पर अपने-आप नहीं पड़ता। इस तरह अदालत ने दोषसिद्धि, अलग-अलग सजाओं और सजा में संभावित माफी के बीच कानूनी अंतर को स्पष्ट किया।
निष्कर्ष यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने उम्रकैद की सजाओं को समाप्त नहीं किया, बल्कि उन्हें लागू करने के तरीके पर कानून की स्थिति दोहराई। राजू शांताराम कोली मामले में लगातार उम्रकैद का निर्देश हटाया गया, जबकि बाकी दोषसिद्धि और सजा संबंधी आदेश बरकरार रहे।