उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में गुरुवार को एक ऐसा विशाल औद्योगिक उपकरण पहुंचा, जिसने पूरे रास्ते लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा। करीब 200 टन वजनी साइक्लाइजेशन रिएक्टर वेसल को 308 पहियों वाले विशेष हाइड्रोलिक ट्रेलर के जरिए आखिरकार कुंभी स्थित प्लांट तक पहुंचा दिया गया। इस विशाल मशीन को देखने के लिए रास्ते में कई जगह लोगों की भीड़ जुटती रही और इसके वीडियो सोशल मीडिया पर भी चर्चा में रहे।
यह मशीन बेल्जियम से लाई गई है और इसका इस्तेमाल कुंभी में तैयार हो रहे बायोप्लास्टिक प्लांट में किया जाएगा। मशीन को उसके गंतव्य तक पहुंचाना सामान्य माल ढुलाई जैसा काम नहीं था। इसके विशाल आकार और वजन को देखते हुए विशेष ट्रेलर, तकनीकी टीम और रूट मैनेजमेंट की जरूरत पड़ी।
308 पहियों वाले 'महाट्रक' ने तय किया लंबा सफर
इस पूरी यात्रा की सबसे खास बात 308 पहियों वाला हाइड्रोलिक मल्टी-एक्सल ट्रेलर रहा। इतने बड़े और भारी उपकरण को सड़क मार्ग से ले जाने के लिए विशेष रूप से तैयार किए गए ट्रेलर का इस्तेमाल किया गया।
रिपोर्ट के मुताबिक, रिएक्टर को समुद्री मार्ग से ओडिशा के पारादीप बंदरगाह तक लाया गया था। वहां से इसे विशेष ट्रेलर पर लादकर सड़क के रास्ते उत्तर प्रदेश के लिए रवाना किया गया। इस दौरान काफिले ने ओडिशा, झारखंड और बिहार से होते हुए उत्तर प्रदेश में प्रवेश किया।
इसके बाद चंदौली, वाराणसी, गाजीपुर, बलरामपुर और श्रावस्ती समेत कई इलाकों से गुजरते हुए यह विशाल खेप लखीमपुर खीरी के कुंभी तक पहुंची।
पांच महीने और करीब 1600 किलोमीटर का सफर
यह सिर्फ भारी मशीन को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने का काम नहीं था। पूरे परिवहन अभियान में करीब पांच महीने और लगभग 1600 किलोमीटर का सफर शामिल रहा।
रास्ते में पुलों, ओवरब्रिज, बिजली के तारों, सड़क की चौड़ाई और यातायात जैसी कई चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए काफिले को आगे बढ़ाया गया। भारी-भरकम ट्रेलर की गति भी सामान्य वाहनों की तुलना में काफी कम रही।
कुछ रिपोर्टों में बताया गया कि रास्ते के कई हिस्सों में ट्रेलर को बेहद धीमी गति से आगे बढ़ना पड़ा। यही वजह है कि इसके गुजरने के समय स्थानीय लोगों में भी खासा कौतूहल देखने को मिला।
सड़क पर निकलता था तो देखने उमड़ती थी भीड़
308 पहियों वाला यह विशाल ट्रक अपने आप में लोगों के लिए आकर्षण बन गया था। जिस इलाके से यह काफिला गुजरता, वहां सड़क किनारे लोग इसे देखने के लिए जमा हो जाते थे।
लखीमपुर खीरी पहुंचने के दौरान भी लोगों ने मोबाइल फोन से इसकी तस्वीरें और वीडियो बनाए। कुछ जगहों पर लोग ट्रक के आकार और पहियों की लंबी कतार देखकर हैरान नजर आए।
इतने बड़े औद्योगिक उपकरण को सड़क से ले जाने के कारण यह यात्रा केवल परिवहन से जुड़ी खबर नहीं रही, बल्कि कई इलाकों में स्थानीय लोगों के लिए कौतूहल का विषय भी बन गई।
आखिर इस रिएक्टर का इस्तेमाल कहां होगा?
अब सबसे बड़ा सवाल है कि आखिर करीब 200 टन की इस मशीन को इतनी दूर से क्यों लाया गया।
यह साइक्लाइजेशन रिएक्टर कुंभी में स्थापित किए जा रहे बायोप्लास्टिक प्लांट की महत्वपूर्ण मशीनरी का हिस्सा है। प्लांट में गन्ने और चीनी से जुड़े कच्चे माल का इस्तेमाल करके पॉलीलैक्टिक एसिड यानी PLA बायोप्लास्टिक तैयार करने की योजना है।
PLA एक जैव-आधारित पॉलिमर है, जिसका इस्तेमाल कई प्रकार के उत्पादों में किया जा सकता है। परियोजना का उद्देश्य पारंपरिक पेट्रोलियम-आधारित प्लास्टिक के विकल्प के तौर पर बायो-आधारित और बायोडिग्रेडेबल सामग्री तैयार करना है।
कुंभी में बन रहा बड़ा बायोप्लास्टिक प्रोजेक्ट
लखीमपुर खीरी के कुंभी क्षेत्र में करीब 3,080 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से एक बड़े इंटीग्रेटेड बायोप्लास्टिक प्लांट की स्थापना की जा रही है।
रिपोर्टों के मुताबिक, परियोजना की प्रस्तावित क्षमता लगभग 80,000 टन PLA प्रतिवर्ष बताई गई है। इसकी खासियत यह होगी कि गन्ने से जुड़े कच्चे माल से लेकर बायोप्लास्टिक तैयार करने की प्रक्रिया को एक ही औद्योगिक परिसर में एकीकृत करने का प्रयास किया जा रहा है।
यानी 200 टन का यह रिएक्टर केवल एक बड़ी मशीन नहीं है, बल्कि इस बड़े औद्योगिक प्रोजेक्ट के लिए महत्वपूर्ण तकनीकी उपकरण है।
बेल्जियम से क्यों मंगाया गया?
इतने बड़े रिएक्टर को विदेश से मंगाने की वजह इसकी सामान्य मशीनरी से अलग तकनीकी जरूरतें हैं। उपलब्ध रिपोर्टों में इसे विशेष औद्योगिक प्रक्रिया के लिए तैयार किया गया उपकरण बताया गया है, जिसके निर्माण में विशेष सामग्री, इंजीनियरिंग और परीक्षण की जरूरत होती है।
ऐसे बड़े और विशेष उपकरणों को तैयार करने के लिए उच्च क्षमता वाली निर्माण सुविधाओं और विशेष तकनीकी विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है। इसलिए परियोजना के लिए इसे बेल्जियम से मंगाया गया।
परिवहन के दौरान क्यों करनी पड़ी इतनी तैयारी?
200 टन वजन और विशाल आकार के कारण इसे सामान्य ट्रक से ले जाना संभव नहीं था। इसके लिए कई एक्सल वाला हाइड्रोलिक ट्रेलर इस्तेमाल किया गया, जिसमें कुल 308 पहिए बताए गए हैं।
इतने बड़े काफिले की आवाजाही के दौरान सड़क की स्थिति और रास्ते में मौजूद संरचनाओं को पहले से देखना जरूरी था। कई जगहों पर यातायात को नियंत्रित किया गया और भारी वाहन के सुरक्षित गुजरने के लिए मार्ग तैयार किया गया।
यही कारण है कि यह मशीन अपने अंतिम गंतव्य तक पहुंचने में लंबा समय ले गई।
अब आगे क्या होगा?
रिएक्टर के कुंभी पहुंचने के बाद अब परियोजना के इंस्टॉलेशन और प्लांट निर्माण से जुड़े काम को आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी।
प्लांट में मशीनरी स्थापित होने के बाद गन्ने और चीनी से जुड़े कच्चे माल को प्रोसेस करके PLA आधारित बायोप्लास्टिक तैयार करने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। इससे परियोजना के औद्योगिक संचालन की दिशा में एक महत्वपूर्ण चरण पूरा हुआ है।
इस परियोजना की प्रगति पर इसलिए भी नजर है क्योंकि इससे लखीमपुर खीरी में औद्योगिक निवेश, रोजगार और गन्ना आधारित वैकल्पिक उत्पादों के विकास की संभावनाएं जुड़ी हैं।
सिर्फ मशीन नहीं, यूपी की औद्योगिक तस्वीर की झलक
लखीमपुर खीरी में पहुंचा यह 200 टन का रिएक्टर सिर्फ अपनी विशालता के कारण चर्चा में नहीं है। इसके पीछे एक ऐसी औद्योगिक परियोजना है, जो गन्ने से मिलने वाले कच्चे माल को पारंपरिक चीनी उत्पादन से आगे ले जाकर बायोप्लास्टिक जैसे नए उत्पादों से जोड़ने की कोशिश कर रही है।
308 पहियों वाला ट्रेलर और उस पर रखा विशाल रिएक्टर इस पूरी परियोजना के सबसे दिखाई देने वाले हिस्से हैं, लेकिन असली महत्व उस प्लांट का है जहां इस उपकरण का इस्तेमाल होगा।
अब इस मशीन के पहुंचने के बाद कुंभी में परियोजना की अगली तस्वीर इंस्टॉलेशन, टेस्टिंग और उत्पादन की तैयारी के रूप में सामने आने की उम्मीद है।