यह फैसला खास तौर पर उन भारतीय विवाहों के लिए महत्वपूर्ण है, जिनमें पति या पत्नी विदेश में जाकर वहां की अदालत से तलाक हासिल करते हैं। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि विदेश में दिया गया हर तलाक भारत में अमान्य होगा।
सुप्रीम कोर्ट के सामने कैसे पहुंचा मामला?
यह फैसला N. Sridhar Reddy बनाम State of Andhra Pradesh मामले में आया। दंपती का विवाह 18 अप्रैल 2003 को आंध्र प्रदेश में हिंदू रीति-रिवाज से हुआ था। पति वर्ष 2005 में नौकरी के लिए ब्रिटेन गया और बाद में पत्नी भी वहां पहुंची।
वैवाहिक संबंध बिगड़ने के बाद पति ने भारत में तलाक की कार्यवाही शुरू की, लेकिन उसे अपेक्षित राहत नहीं मिली। इसके बाद उसने ब्रिटेन की अदालत में तलाक की अर्जी दी। ब्रिटिश अदालत ने 29 जनवरी 2014 को विवाह के अपूरणीय टूटने के आधार पर तलाक को अंतिम रूप दिया। इसके बाद पति ने ब्रिटेन में दूसरी शादी कर ली।
पहली पत्नी ने दूसरी शादी को लेकर भारत में द्विविवाह (Bigamy) और आपराधिक साजिश की शिकायत दर्ज कराई। पति ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर अपने खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की मांग की थी।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर की पीठ ने कहा कि विदेशी अदालत का तलाक आदेश भारत में अपने-आप मान्य नहीं हो जाता। उसे भारतीय कानून के तहत निर्धारित शर्तें पूरी करनी होंगी।
इस मामले में विवाह हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत हुआ था। अदालत ने कहा कि इस कानून में केवल विवाह के अपूरणीय टूटने को तलाक का स्वतंत्र वैधानिक आधार नहीं माना गया है। इसलिए इसी आधार पर ब्रिटेन की अदालत से मिला तलाक भारतीय कानून के तहत स्वतः मान्यता प्राप्त नहीं कर सकता।
CPC की धारा 13 क्यों है महत्वपूर्ण?
सुप्रीम कोर्ट ने सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 13 और 14 का उल्लेख किया। धारा 13 के अनुसार, विदेशी अदालत का फैसला कुछ परिस्थितियों में भारत में निर्णायक नहीं माना जा सकता। उदाहरण के लिए:
- विदेशी अदालत के पास मामले की उचित न्यायिक अधिकारिता न हो।
- फैसला मामले के गुण-दोष पर आधारित न हो।
- भारतीय कानून लागू होने के बावजूद उसे नजरअंदाज किया गया हो।
- कार्यवाही प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ हुई हो।
- फैसला धोखाधड़ी से हासिल किया गया हो।
- फैसला भारत में लागू कानून के उल्लंघन पर आधारित हो।
अदालत ने स्पष्ट किया कि विदेशी तलाक की मान्यता तय करते समय विवाह पर लागू कानून, विदेशी अदालत की अधिकारिता और दोनों पक्षों की भागीदारी को भी देखना जरूरी है।
क्या विदेशी नागरिकता लेने से भारतीय कानून से बच सकते हैं?
इस फैसले का एक अहम पहलू यह भी है कि पति ने ब्रिटिश नागरिकता हासिल कर ली थी और दूसरी शादी भी ब्रिटेन में की थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बाद में विदेशी नागरिकता प्राप्त कर लेना पहली भारतीय शादी से जुड़े कानूनी दायित्वों को अपने-आप समाप्त नहीं करता।
पीठ ने पति के खिलाफ द्विविवाह की आपराधिक कार्यवाही रद्द करने से इनकार कर दिया। हालांकि, अदालत ने पति के माता-पिता और दूसरी पत्नी के खिलाफ कार्यवाही रद्द कर दी, क्योंकि रिकॉर्ड में उनके सक्रिय रूप से साजिश में शामिल होने के पर्याप्त विशिष्ट आरोप या सामग्री नहीं थी।
क्या हर विदेशी तलाक भारत में अमान्य होगा?
नहीं। इस फैसले का अर्थ यह नहीं है कि विदेश में मिला हर तलाक भारत में अमान्य होगा। विदेशी तलाक को मान्यता मिल सकती है, यदि वह CPC की धारा 13 और संबंधित वैवाहिक कानून की शर्तें पूरी करता हो।
सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी स्पष्ट किया है कि कुछ परिस्थितियों में विदेशी अदालत की अधिकारिता स्वीकार करना, वहां स्वेच्छा से और प्रभावी रूप से कार्यवाही में भाग लेना या तलाक के लिए सहमति देना महत्वपूर्ण हो सकता है। लेकिन केवल विदेशी अदालत से तलाक का आदेश हासिल कर लेना पर्याप्त नहीं है।