Skip to content
24/7 News Uttar Pradesh
Breaking

यूपी में सरकारी नौकरी के नियम सख्त! हिंसक संगठनों से जुड़े लोगों की भर्ती पर रोक, नया शासनादेश जारी

योगी सरकार ने सरकारी भर्ती के लिए चरित्र सत्यापन की नई एकीकृत नीति लागू की। हिंसा के जरिए मौजूदा सामाजिक व्यवस्था बदलने का उद्देश्य रखने वाले संगठनों से जुड़े अभ्यर्थी अयोग्य हो सकते हैं; केवल राजनीतिक विचारधारा या शांतिपूर्ण विरोध पर रोक नहीं।

यूपी में सरकारी नौकरी के नियम सख्त! हिंसक संगठनों से जुड़े लोगों की भर्ती पर रोक, नया शासनादेश जारी
प्रतीकात्मक तस्वीर, AI से बनाई गई। यह वास्तविक घटना का चित्रण नहीं है।

उत्तर प्रदेश में सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए महत्वपूर्ण खबर है। राज्य सरकार ने सरकारी सेवाओं में सीधी भर्ती से पहले अभ्यर्थियों के चरित्र और आपराधिक रिकॉर्ड की जांच से जुड़े नियमों को सख्त और व्यवस्थित करते हुए नया शासनादेश जारी किया है।

28 अक्टूबर 2026 को नियुक्ति एवं कार्मिक विभाग के प्रमुख सचिव एम. देवराज की ओर से जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार, ऐसे अभ्यर्थियों को सरकारी नौकरी के लिए अयोग्य माना जाएगा जो किसी ऐसे संगठन के सदस्य हों, जिसका घोषित उद्देश्य हिंसक तरीकों से समाज की मौजूदा व्यवस्था को बदलना हो।

यह नीति केवल सामान्य सरकारी विभागों तक सीमित नहीं है। इसके दायरे में सरकारी निगम, बोर्ड, परिषद, शैक्षणिक संस्थान, सार्वजनिक उपक्रम और शहरी एवं ग्रामीण स्थानीय निकाय भी शामिल हैं।

हिंसक गतिविधियों से जुड़े संगठनों के सदस्यों पर क्या नियम?

नए शासनादेश में स्पष्ट किया गया है कि किसी ऐसे संगठन की सदस्यता, जिसका घोषित उद्देश्य हिंसक तरीकों से मौजूदा सामाजिक व्यवस्था को बदलना है, सरकारी नौकरी के लिए अयोग्यता का आधार बन सकती है।

इसके अलावा, यदि कोई अभ्यर्थी 21 वर्ष की उम्र पूरी करने के बाद और चरित्र सत्यापन की तारीख से पिछले तीन वर्षों के दौरान ऐसी हिंसक गतिविधियों में शामिल रहा है, तो उसकी सक्रिय संलिप्तता पर विचार किया जा सकता है।

हालांकि, यदि अभ्यर्थी अपने आचरण में वास्तविक और सकारात्मक बदलाव के ठोस दस्तावेजी प्रमाण प्रस्तुत करता है, तो संबंधित अधिकारी उन पर भी विचार कर सकते हैं। यानी नियमों में अभ्यर्थी के पुराने रिकॉर्ड के साथ उसके बाद के व्यवहार को भी महत्व दिया गया है। 

क्या सरकार की आलोचना या शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों को नौकरी नहीं मिलेगी?

नए नियमों को लेकर अभ्यर्थियों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सरकार के खिलाफ आवाज उठाने या किसी राजनीतिक विचारधारा का समर्थन करने से सरकारी नौकरी का रास्ता बंद हो जाएगा?

इस पर नियुक्ति विभाग ने 29 अक्टूबर को स्पष्टीकरण जारी किया। विभाग के अनुसार, लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक विचार रखना, सरकार की नीतियों की आलोचना करना और शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखना अलग विषय हैं। इन्हें हिंसक गतिविधियों के बराबर नहीं माना जा सकता।

इसलिए केवल राजनीतिक विचारधारा, वैचारिक असहमति या शांतिपूर्ण विरोध किसी अभ्यर्थी को सरकारी नौकरी के लिए अयोग्य घोषित करने का आधार नहीं होगा। नियम का संबंध उन संगठनों और गतिविधियों से है, जिनका घोषित उद्देश्य हिंसा के माध्यम से मौजूदा व्यवस्था बदलना है। 

किन अपराधों में सरकारी नौकरी के लिए अयोग्यता हो सकती है?

शासनादेश में गंभीर अपराधों और उनके कानूनी चरणों के आधार पर अलग-अलग प्रावधान रखे गए हैं। इनमें हत्या, दुष्कर्म, मानव तस्करी, फिरौती के लिए अपहरण, आतंकवादी गतिविधियां, संगठित अपराध, कुछ साइबर अपराध और भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक या सॉल्वर गैंग से जुड़े अपराध शामिल हैं।

कुछ गंभीर अपराधों में अदालत द्वारा आरोप तय किए जाने का चरण ही अयोग्यता के लिए पर्याप्त हो सकता है, जबकि सार्वजनिक व्यवस्था और आर्थिक अनियमितताओं से जुड़े कुछ अपराधों में दोषसिद्धि जरूरी होगी। यह फैसला संबंधित अपराध की श्रेणी और शासनादेश में निर्धारित शर्तों के अनुसार होगा।

सिर्फ FIR दर्ज होने से नौकरी नहीं जाएगी

इस शासनादेश का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि किसी अभ्यर्थी के खिलाफ केवल FIR दर्ज होना या पुलिस जांच लंबित होना अपने आप में सरकारी नौकरी के लिए अयोग्यता नहीं माना जाएगा।

अपराध की प्रकृति, मामले की कानूनी स्थिति और अदालत में आरोप तय होने जैसे पहलुओं को निर्धारित नियमों के अनुसार देखा जाएगा।

कुछ परिस्थितियों में अभ्यर्थियों को राहत भी दी गई है:

अदालत से अंतिम रूप से बरी या आरोपमुक्त होने पर संबंधित अपवाद लागू हो सकते हैं।

हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट द्वारा मामला निरस्त किए जाने पर नियमों के अनुसार विचार होगा।

कानूनी रूप से मान्य समझौते या अभियोजन वापस लिए जाने के मामलों में भी प्रावधान लागू होंगे।

किशोर न्याय कानून के तहत निपटाए गए मामलों और कुछ छोटे अपराधों को अलग श्रेणी में रखा गया है। 

दो या अधिक आपराधिक मामलों में भी हो सकती है कार्रवाई

नई नीति में आदतन अपराधियों (Habitual Offenders) के लिए भी अलग प्रावधान किया गया है।

यदि किसी अभ्यर्थी के खिलाफ अलग-अलग मामलों में दो या उससे अधिक चार्जशीट दाखिल हो चुकी हैं और उनमें से कम से कम एक पिछले तीन वर्षों के भीतर दाखिल हुई है, तो उसकी पात्रता पर सवाल उठ सकता है।

इसी तरह, पिछले पांच वर्षों में तीन या उससे अधिक अलग-अलग मामलों में अदालत द्वारा आरोप तय किए जाने की स्थिति में भी अभ्यर्थी को अयोग्य घोषित करने पर विचार किया जा सकता है। यह प्रक्रिया शासनादेश में निर्धारित शर्तों और संबंधित मामलों की प्रकृति के अनुसार होगी।

अब अभ्यर्थियों को देना होगा आपराधिक मामलों का पूरा विवरण

नई नीति में अभ्यर्थियों के लिए स्वघोषणा और जानकारी देने की जिम्मेदारी भी बढ़ाई गई है। सरकारी नौकरी के लिए आवेदन करने वाले उम्मीदवारों को बताना होगा कि वे कभी किसी आपराधिक मामले में गिरफ्तार हुए हैं या नहीं, उनके खिलाफ अभियोजन चला है या दोषसिद्धि हुई है या नहीं।

इसके अलावा, उन्हें निम्न जानकारियां भी देनी होंगी:

लंबित और समाप्त हो चुके आपराधिक मामलों का विवरण।

गिरफ्तारी और अभियोजन से जुड़ी जानकारी।

निवारक कार्रवाई का विवरण।

पिछली सरकारी सेवा से बर्खास्तगी की जानकारी।

भर्ती आयोग या बोर्ड द्वारा अनुचित साधनों के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाए जाने का विवरण।

यदि कोई अभ्यर्थी महत्वपूर्ण जानकारी छिपाता है और बाद में सत्यापन के दौरान यह सामने आता है, तो उसकी नियुक्ति रद्द की जा सकती है और आगे कानूनी कार्रवाई भी हो सकती है।

पुलिस सत्यापन की रिपोर्ट 30 दिनों में देनी होगी

सरकार ने भर्ती प्रक्रिया को अनावश्यक रूप से लंबा होने से बचाने के लिए चरित्र सत्यापन की समयसीमा भी निर्धारित की है।

नए दिशा-निर्देशों के अनुसार, जिला पुलिस और स्थानीय अभिसूचना इकाई (LIU) को संबंधित अनुरोध मिलने के 30 दिनों के भीतर सत्यापन रिपोर्ट देनी होगी।

सामान्य सत्यापन के दौरान अभ्यर्थियों को पूछताछ के लिए घर बुलाने या थाने में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा। यदि रिपोर्ट में कोई प्रतिकूल तथ्य सामने आता है, तो जिलाधिकारी को अंतिम सिफारिश भेजने से पहले अभ्यर्थी को अपना पक्ष रखने का अवसर देना होगा। यह अवसर व्यक्तिगत रूप से या ऑनलाइन दिया जा सकता है। 

क्या पुलिस सत्यापन पूरा होने से पहले मिल सकेगा नियुक्ति पत्र?

नई नीति में सामान्य पदों के लिए एक महत्वपूर्ण बदलाव किया गया है। यदि चरित्र सत्यापन की प्रक्रिया लंबित है, तो केवल इसी कारण नियुक्ति पत्र रोकना जरूरी नहीं होगा।

नियुक्ति प्राधिकारी निर्धारित सत्यापन फॉर्म और अभ्यर्थी के स्वघोषणा पत्र के आधार पर औपबंधिक नियुक्ति दे सकते हैं। हालांकि, यदि बाद में दी गई जानकारी गलत या अधूरी पाई जाती है, तो नियुक्ति रद्द की जा सकती है।

वहीं, संवेदनशील पदों और ऐसे पदों पर जहां सुरक्षा के लिहाज से विस्तृत जांच जरूरी है, पहले सत्यापन पूरा करना होगा। ऐसे मामलों में नियुक्ति से पहले मुख्यमंत्री की पूर्व अनुमति की व्यवस्था भी रखी गई है।

पहले से सरकारी नौकरी कर रहे कर्मचारियों पर क्या असर?

शासनादेश में पहले से सरकारी सेवा में कार्यरत कर्मचारियों के लिए भी स्थिति स्पष्ट की गई है। मौजूदा कर्मचारियों का नए नियमों के तहत दोबारा सामान्य चरित्र सत्यापन नहीं कराया जाएगा।

हालांकि, जरूरत पड़ने पर उनके पुराने विभागों से सेवा संबंधी रिकॉर्ड और आवश्यक दस्तावेज मंगाए जा सकते हैं। 

पुराने नियमों को एक जगह लाने की कवायद

नियुक्ति विभाग के अनुसार, चरित्र सत्यापन से संबंधित प्रावधान पहले भी अलग-अलग सरकारी आदेशों में मौजूद थे। इनमें 1958, 1978, 1985, 2013 और 2021 के आदेश शामिल थे।

नए शासनादेश में इन प्रावधानों को एक जगह संकलित करके अधिक स्पष्ट और व्यवस्थित प्रक्रिया बनाई गई है। यह कदम इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्देशों के अनुपालन में उठाया गया है। <Cite refs={["turn785600search0","turn785600search4","turn785600search6"]}/>

निष्कर्ष: उत्तर प्रदेश सरकार की नई भर्ती नीति में गंभीर अपराधों, हिंसक गतिविधियों और आपराधिक रिकॉर्ड के सत्यापन को लेकर स्पष्ट मानदंड तय किए गए हैं। हिंसक तरीके से सामाजिक व्यवस्था बदलने का घोषित उद्देश्य रखने वाले संगठनों से जुड़े लोगों को अयोग्य माना जा सकता है। दूसरी ओर, राजनीतिक विचारधारा और शांतिपूर्ण विरोध को अयोग्यता का आधार नहीं बनाया गया है। अभ्यर्थियों के लिए सबसे जरूरी बात है कि आवेदन और स्वघोषणा में अपने रिकॉर्ड की सही जानकारी दें।