Skip to content
24/7 News Uttar Pradesh
Breaking

गोमती की बाढ़ उतर गई, लेकिन फैजुल्लागंज की मुसीबत क्यों नहीं? एक महीने बाद भी साफ पानी के लिए टैंकरों का सहारा

लोह्रामऊ और मिल्लतनगर समेत प्रभावित बस्तियों में कई बोरवेल बंद या दूषित पानी दे रहे हैं। नगर निगम ने टैंकर तैनात किए और सबमर्सिबल पंपों का पानी पीने से बचने की सलाह दी; निवासी नियमित आपूर्ति और भूजल की जांच की मांग कर रहे हैं।

गोमती की बाढ़ उतर गई, लेकिन फैजुल्लागंज की मुसीबत क्यों नहीं? एक महीने बाद भी साफ पानी के लिए टैंकरों का सहारा
प्रतीकात्मक तस्वीर, AI से बनाई गई। यह वास्तविक घटना का चित्रण नहीं है।

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के फैजुल्लागंज में गोमती नदी की बाढ़ का पानी उतरने के बाद भी जनजीवन पूरी तरह सामान्य नहीं हो पाया है। बाढ़ के दौरान घरों और गलियों में पानी भरने से पहले ही लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा था, लेकिन अब संकट का बड़ा कारण साफ पेयजल की कमी और घरेलू बोरवेल का खराब होना बन गया है।

28 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित द टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, बाढ़ का पानी उतरे करीब एक महीने बाद भी कई परिवारों को पीने और खाना बनाने के लिए नगर निगम के टैंकरों पर निर्भर रहना पड़ रहा है। कुछ घरों के बोरवेल पानी देना बंद कर चुके हैं, जबकि कुछ से गंदा और बदबूदार पानी निकल रहा है। 

यह समस्या केवल पानी की उपलब्धता तक सीमित नहीं है। बाढ़ के बाद भूजल की गुणवत्ता को लेकर अनिश्चितता, घरों की सफाई और सीवर व्यवस्था से जुड़ी दिक्कतों ने भी स्थानीय परिवारों की मुश्किलें बढ़ाई हैं।

किन इलाकों में सबसे ज्यादा परेशानी?

रिपोर्टों में लोह्रामऊ, मिल्लतनगर, फैजुल्लागंज ढाल और मामा कॉलोनी जैसे इलाकों का उल्लेख किया गया है। यहां कई परिवार घरेलू बोरवेल और सबमर्सिबल पंपों से पानी प्राप्त करते थे। बाढ़ के बाद इन स्रोतों के बंद होने या उनसे दूषित पानी आने की शिकायतें सामने आईं।

मिल्लतनगर के निवासी अनवर अली ने बताया कि पहले उनके परिवार को अपने बोरवेल से पानी मिल जाता था, लेकिन अब कभी पानी आता ही नहीं और कभी गंदा पानी निकलता है। ऐसे में परिवारों को टैंकर आने का इंतजार करना पड़ता है और पानी जमा करके रखना पड़ता है।

स्थानीय निवासियों ने यह भी चिंता जताई कि जब तक भूजल की जांच नहीं हो जाती, तब तक यह तय करना मुश्किल है कि घरेलू पंप से आने वाला पानी पीने के लिए सुरक्षित है या नहीं।

नगर निगम ने क्या कदम उठाए?

लखनऊ नगर निगम और जलकल विभाग ने प्रभावित क्षेत्रों में पेयजल उपलब्ध कराने के लिए टैंकर भेजे हैं। 19 अक्टूबर की रिपोर्ट में जलकल विभाग के महाप्रबंधक कुलदीप सिंह के हवाले से बताया गया था कि प्रभावित इलाकों में करीब 25 पानी के टैंकर तैनात किए गए थे। लोगों को जरूरत पड़ने पर हेल्पलाइन के माध्यम से टैंकर मंगाने की सुविधा भी बताई गई। 

नगर निगम ने बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में सबमर्सिबल पंपों से पीने का पानी इस्तेमाल न करने की सलाह भी दी है। यह सावधानी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बाढ़ के पानी के संपर्क में आने से भूजल स्रोत दूषित हो सकते हैं। हालांकि, किसी खास बोरवेल में किस प्रकार का प्रदूषण है, इसकी पुष्टि पानी की जांच से ही हो सकती है।

स्थानीय निवासियों की मांग है कि टैंकरों की आपूर्ति नियमित हो और किसी एक इलाके तक सीमित न रहे। परिवारों को केवल पानी पहुंचाना ही नहीं, बल्कि यह भरोसा भी चाहिए कि उनके घरों के स्थायी जलस्रोत कब दोबारा सुरक्षित इस्तेमाल के योग्य होंगे।

बाढ़ के बाद सीवर और सफाई की समस्या भी बनी चुनौती

फैजुल्लागंज में बाढ़ के बाद की परेशानी पेयजल तक सीमित नहीं रही। 11 अक्टूबर को प्रकाशित हिन्दुस्तान की रिपोर्ट के अनुसार, नगर निगम के सर्वे में क्षेत्र के 10 हजार से अधिक घरों के सीवर टैंक भरने की जानकारी सामने आई थी। रिपोर्ट में सीवर लाइनों में पानी भरने और सफाई के लिए सुपर सक्शन मशीनें लगाने की तैयारी का भी उल्लेख था। 

बाढ़ के बाद घरों और गलियों से पानी हटाना पहला कदम है, लेकिन इसके बाद जमा गाद, कचरा, सीवर और दूषित जलस्रोतों की सफाई भी जरूरी होती है। यदि इन व्यवस्थाओं को पूरी तरह दुरुस्त नहीं किया जाता, तो परिवारों को घर लौटने के बाद भी दैनिक जरूरतों को पूरा करने में कठिनाई हो सकती है।

प्रभावित इलाकों में सफाई और जलनिकासी के काम किए जाने की रिपोर्टें आई हैं, लेकिन हर मोहल्ले में पेयजल की स्थिति एक जैसी नहीं है। इसलिए समस्या का आकलन स्थानीय स्तर पर करना जरूरी है। 

बच्चों और बुजुर्गों के लिए क्यों बढ़ जाती है परेशानी?

जब किसी इलाके में नियमित पेयजल उपलब्ध नहीं होता, तो परिवारों को पानी भरने, उसे जमा करने और जरूरत के अनुसार इस्तेमाल करने में अतिरिक्त समय देना पड़ता है। जिन घरों में छोटे बच्चे, बुजुर्ग या बीमार लोग हैं, वहां यह परेशानी और गंभीर हो सकती है।

दूषित पानी का सेवन पेट और आंतों से संबंधित संक्रमण का जोखिम बढ़ा सकता है। इसीलिए बाढ़ के बाद पानी को केवल देखने या उसकी गंध के आधार पर सुरक्षित नहीं मानना चाहिए। जब तक संबंधित विभाग पानी की गुणवत्ता की पुष्टि न करे, तब तक पीने और खाना बनाने के लिए सुरक्षित स्रोत का उपयोग करना उचित है।

यदि पानी का रंग बदला हुआ हो, उसमें दुर्गंध आ रही हो या उसमें गंदगी दिखाई दे, तो उसे पीने के लिए इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। ऐसे पानी के बारे में स्थानीय जलकल विभाग को सूचित करना और स्वच्छ पेयजल की वैकल्पिक व्यवस्था मांगना जरूरी है।

स्थानीय लोगों की मांग—सिर्फ टैंकर नहीं, स्थायी समाधान चाहिए

फैजुल्लागंज के निवासियों की प्रमुख मांगें हैं कि प्रभावित बस्तियों में नियमित टैंकर भेजे जाएं, खराब बोरवेल और सबमर्सिबल पंपों की जांच हो तथा पानी की गुणवत्ता की पुष्टि की जाए। लोगों को यह भी स्पष्ट जानकारी मिलनी चाहिए कि उनके इलाके में घरेलू जलस्रोत कब तक सुरक्षित रूप से इस्तेमाल किए जा सकेंगे।

लंबे समय के समाधान के लिए केवल अस्थायी टैंकर व्यवस्था पर्याप्त नहीं होगी। जलस्रोतों की जांच, दूषित बोरवेल की सफाई या मरम्मत, सीवर व्यवस्था को दुरुस्त करना और जरूरत पड़ने पर वैकल्पिक पाइपलाइन आपूर्ति की व्यवस्था करना महत्वपूर्ण होगा।

हालांकि, अभी उपलब्ध रिपोर्टों से यह स्पष्ट नहीं है कि हर प्रभावित घर का बोरवेल कब तक ठीक होगा या सभी इलाकों में पानी की आपूर्ति कब सामान्य हो जाएगी। इसके लिए नगर निगम और जलकल विभाग की ओर से क्षेत्रवार जानकारी की आवश्यकता है।

निष्कर्ष: बाढ़ का पानी उतरना राहत है, लेकिन संकट का अंत नहीं

फैजुल्लागंज की स्थिति बताती है कि बाढ़ का पानी उतरने के बाद भी प्रभावित परिवारों को लंबे समय तक बुनियादी सुविधाओं की कमी का सामना करना पड़ सकता है। फिलहाल साफ पेयजल, खराब बोरवेल की जांच और सीवर-सफाई व्यवस्था को बहाल करना सबसे जरूरी है।

स्थानीय निवासियों के सामने अब सबसे बड़ा सवाल है—वे अपने घरों के पानी को दोबारा सुरक्षित कब इस्तेमाल कर पाएंगे? इसका जवाब नियमित जलापूर्ति, भूजल की जांच और प्रभावित इलाकों में स्थायी मरम्मत के काम से ही मिल सकेगा।