उत्तर प्रदेश में खाद्य कारोबारी अब पुराने उत्पादों को दोबारा पैक करके ताज़ा नहीं बता सकेंगे। फूड सेफ्टी एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीएसए) विभाग ने आदेश दिया है कि पैक्ड खाद्य उत्पादों पर असली निर्माण या प्रोसेसिंग तारीख लिखना ज़रूरी होगा, न कि बाद में रीपैकिंग की तारीख।
एफडीएसए की प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, यह फैसला खाद्य निर्माण इकाइयों में हुई विशेष जांच के बाद लिया गया है। जांच में अधिकारियों को कई ऐसे मामले मिले जहां उत्पादों को निर्माण के लंबे समय बाद छोटे उपभोक्ता पैक में दोबारा पैक किया जा रहा था।
पैकिंग तारीख को बताया जा रहा था निर्माण तारीख
कुछ मामलों में लेबल पर असली निर्माण तारीख की जगह केवल पैकिंग तारीख दर्ज की जा रही थी। विभाग ने अब स्पष्ट किया है कि उत्तर प्रदेश में पैक होने वाले सभी खाद्य उत्पादों के लेबल पर वही तारीख होनी चाहिए, जिस दिन उत्पाद वास्तव में बना या प्रोसेस हुआ।
यह आदेश उपभोक्ताओं को उत्पाद की उम्र, ताज़गी और बची हुई शेल्फ लाइफ के बारे में गुमराह होने से बचाने के लिए लाया गया है। खाद्य सुरक्षा अधिकारियों ने कहा कि निर्माण तारीख और पैकिंग तारीख में अंतर समझना ज़रूरी है, क्योंकि उत्पाद की शेल्फ लाइफ उसकी असली निर्माण तारीख से गिनी जाती है, बाद में पैक होने की तारीख से नहीं।
रीपैकर्स पर भी सख्ती
जांच के दौरान अधिकारियों को यह भी पता चला कि कई रीपैकर और रीलेबलर पैकिंग तारीख को ही लेबल पर मुख्य तारीख के रूप में इस्तेमाल कर रहे थे। नए निर्देशों के तहत खाद्य कारोबारियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उत्पाद दोबारा पैक होने के बाद भी उसकी असली निर्माण तारीख साफ पहचानी जा सके।
विभाग ने इस कदम को एक और गंभीर मुद्दे से भी जोड़ा है। पुराने खाद्य उत्पादों का इस्तेमाल कहीं दूसरे उत्पादों में कच्चे माल के रूप में हो सकता है। अगर मूल निर्माण तारीख को बाद की पैकिंग तारीख से बदल दिया जाए, तो उपभोक्ताओं और यहां तक कि दूसरे खाद्य कारोबारियों के लिए भी यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि सामग्री कितने समय से स्टोर में रखी है।
खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत कदम
यह उपाय खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 के उपभोक्ता हित, सार्वजनिक स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा से जुड़े लक्ष्यों के संदर्भ में लाया गया है। इससे उपभोक्ताओं को उत्पाद की असली उम्र की स्पष्ट जानकारी मिलने की उम्मीद है।
निर्माण तारीख, उत्पाद की घोषित शेल्फ लाइफ या बेस्ट-बिफोर/यूज़-बाय तारीख के साथ मिलकर उपभोक्ताओं को यह आंकने में मदद करेगी कि उत्पाद कितने समय से बाज़ार में उपलब्ध है और उसकी बची हुई शेल्फ लाइफ कितनी है।
एफडीएसए की आयुक्त रोशन जैकब ने कहा कि यह कदम खाद्य कारोबारियों के बीच जवाबदेही बढ़ाएगा। उन्होंने कहा कि इससे निर्माण से लेकर रिटेल तक उत्पाद की ट्रेसेबिलिटी भी बेहतर होगी।